जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप, न सिर्फ पृथ्वी से बल्कि पृथ्वी की कक्षा से भी काफी दूर अंतरिक्ष में स्थित है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप सूर्य–पृथ्वी के दूसरे लैग्रांज पॉइंट (L2) पर तैनात है। JWST पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर (1.5 मिलियन किमी) दूर है।
L2 प्वाइंट, यानी सूर्य-पृथ्वी का दूसरा लैग्रांज बिंदु, अंतरिक्ष की वह खास जगह है जहां सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण एक-दूसरे को इस तरह संतुलित कर लेते हैं कि वहां मौजूद अंतरिक्ष यान बेहद स्थिर स्थिति में रह सकता है। यह स्थान पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर, सूर्य की विपरीत दिशा में स्थित है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप को यहीं इसलिए रखा गया है क्योंकि यह जगह उसके वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
JWST के लिए L2 प्वाइंट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक ही दिशा में रहते हैं। इससे टेलीस्कोप की विशाल सनशील्ड लगातार इन तीनों की गर्मी और रोशनी को एक ही ओर से रोक पाती है। नतीजा यह होता है कि टेलीस्कोप के उपकरण बेहद ठंडे रहते हैं, जो इंफ्रारेड अवलोकन के लिए जरूरी है। अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ जाए तो दूर की आकाशगंगाओं और ग्रहों से आने वाली कमजोर गर्मी-किरणों को पकड़ना मुश्किल हो जाता।
L2 पर रहने से JWST को पृथ्वी की कक्षा में होने वाली समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है। यहां न तो बार-बार पृथ्वी की छाया में जाने की दिक्कत है और न ही तेज तापमान बदलाव का खतरा। इसी वजह से टेलीस्कोप लगातार लंबे समय तक बिना रुकावट अंतरिक्ष का अवलोकन कर सकता है। यह स्थिरता उसे ब्रह्मांड के शुरुआती दौर, दूरस्थ आकाशगंगाओं, तारों के जन्म और दूसरे ग्रहों के वातावरण जैसे रहस्यों को साफ-साफ देखने में मदद देती है।
JWST की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है दूसरे तारों के चारों ओर घूमने वाले ग्रहों यानी एक्सोप्लैनेट्स के वायुमंडल का अध्ययन। इसने पहली बार कई एक्सोप्लैनेट्स के वातावरण में पानी की भाप, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसों की मौजूदगी की पुष्टि की है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि कौन से ग्रह जीवन के अनुकूल हो सकते हैं और किन परिस्थितियों में जीवन पनप सकता है।
इस टेलीस्कोप ने हमें ब्रह्मांड के शुरुआती दौर की झलक दिखाई है, जब बिग बैंग के कुछ सौ मिलियन साल बाद पहली आकाशगंगाएं और तारे बन रहे थे। JWST ने बेहद दूर स्थित, अत्यंत प्राचीन आकाशगंगाओं की पहचान की है, जो यह बताती हैं कि ब्रह्मांड में संरचनाएं उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से विकसित हुईं। इस टेलीस्कोप ने तारों के जन्म की प्रक्रिया को भी पहले से कहीं ज्यादा साफ तरीके से दिखाया है। गैस और धूल के घने बादलों के भीतर झांककर JWST ने यह समझने में मदद की कि नए तारे और उनके आसपास ग्रह कैसे बनते हैं। ओरायन नेबुला और कैरिना नेबुला जैसी जगहों की तस्वीरों ने साबित किया कि तारा-निर्माण कितना जटिल और गतिशील होता है।
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप किसी एक देश का नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग का नतीजा है। इसका नेतृत्व अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA कर रही है, जबकि इसमें यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी (CSA) भी बराबी की साझेदार हैं। NASA ने टेलीस्कोप का मुख्य ढांचा, दर्पण और प्रक्षेपण मिशन संभाला। ESA ने इसके कुछ प्रमुख वैज्ञानिक उपकरण, लॉन्च से जुड़ी सेवाएं और Ariane-5 रॉकेट उपलब्ध कराया, जबकि कनाडा ने हाई-टेक सेंसर और गाइडेंस सिस्टम दिए।