शोध के अनुसार, मीथेन के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण 'हाइड्रॉक्सिल रेडिकल्स' (OH) में आई भारी कमी है। ये वे केमिकल हैं जो हवा में मीथेन को तोड़ने और उसे साफ करने का काम करते हैं। 2020-2021 के दौरान यह कुदरती सफाई प्रक्रिया काफी धीमी हो गई, जिससे मीथेन वातावरण में तेजी से जमा होने लगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि साल-दर-साल होने वाले बदलावों में 80 प्रतिशत भूमिका इसी प्रक्रिया के सुस्त पड़ने की रही है।
2020 से 2023 के बीच 'ला नीना' (La Nina) के लंबे प्रभाव के कारण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropics) में सामान्य से अधिक बारिश हुई। अधिक बारिश और नमी ने बाढ़ जैसी स्थितियों को जन्म दिया, जो मीथेन पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों (microbes) के लिए आदर्श माहौल है। जिसके चलते, आर्द्रभूमि, नदियों और झीलों से मीथेन का उत्सर्जन काफी बढ़ गया।
आंकड़े बताते हैं कि 2019 और 2023 के बीच वायुमंडलीय मीथेन में 55 पीपीबी (Parts Per Billion) की बढ़ोतरी हुई। साल 2023 में यह रिकॉर्ड 1921 पीपीबी के स्तर पर पहुंच गई। सबसे तेज वृद्धि 2021 में देखी गई, जब मीथेन का स्तर करीब 18 पीपीबी बढ़ गया, जो 2019 की तुलना में 84 प्रतिशत अधिक था।
बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर Hanqin Tian ने बताया कि यह बढ़ोतरी केवल नेचुरव वेटलैंड्स तक सीमित नहीं थी। धान के खेत और इस जैसे और पानी के जमा होने वाली जगहों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अक्सर वैश्विक मॉडलों में इन स्रोतों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता, लेकिन फिलहाल संकट में इनका बड़ा हाथ है।
शोध में एक दिलचस्प तथ्य यह सामने आया कि कोविड-19 लॉकडाउन का भी मीथेन पर असर पड़ा। लॉकडाउन के दौरान नाइट्रोजन ऑक्साइड के स्तर में कमी आई, जिसके कारण हाइड्रॉक्सिल (OH) रेडिकल्स कम बने। इसी वजह से वातावरण की मीथेन साफ करने की क्षमता घट गई और गैस का स्तर बढ़ गया।
मीथेन के उत्सर्जन में सबसे बड़ी बढ़त उष्णकटिबंधीय अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में देखी गई। यहां तक कि आर्कटिक क्षेत्रों में भी बढ़ते तापमान ने सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ा दी, जिससे वहां के वेटलैंड्स से मीथेन निकलने लगी। इसके उलट, दक्षिण अमेरिका में 2023 में सूखे के कारण उत्सर्जन में गिरावट देखी गई, जो यह दर्शाता है कि मीथेन का स्तर क्लाइमेट चेंज के प्रति कितना संवेदनशील है।
प्रोफेसर तियान का कहना है कि अगर हमें 'ग्लोबल मीथेन प्लेज' (GMP) के लक्ष्यों को हासिल करना है, तो हमें इंसानी उत्सर्जन के साथ-साथ प्रकृति-जनित (climate-driven) मीथेन स्रोतों पर भी ध्यान देना होगा। गर्म और गीली होती धरती खुद मीथेन के उत्सर्जन को बढ़ा रही है, जिससे जलवायु परिवर्तन का चक्र और खतरनाक हो सकता है।