वैज्ञानिकों ने अलास्का के टुंड्रा क्षेत्र में जमीन के अंदर से 'पीट कोर' (मिट्टी के नमूने) निकाले, जो करीब आधा मीटर गहरे थे। इन नमूनों के अध्ययन से पता चला कि ईसा पूर्व 1000 साल से लेकर अब तक के रिकॉर्ड में हालिया आग की घटनाएं सबसे चरम पर हैं। मुख्य शोधकर्ता एंजेलिका फेउर्डियन के अनुसार, यह बदलाव इस बात का संकेत है कि हमारा प्राकृतिक तंत्र बहुत तेजी से बदल रहा है।
इस शोध के लिए ब्रूक्स रेंज के उत्तर में नौ अलग-अलग स्थानों से मिट्टी के नमूने लिए गए। इन नमूनों में मौजूद चारकोल (कोयले के अंश), परागकण (Pollens) और पौधों के अवशेषों का विश्लेषण किया गया। 'रेडियोकार्बन डेटिंग' तकनीक के जरिए वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि किस सदी में मिट्टी कितनी गीली थी और उस समय वहां कैसी वनस्पति मौजूद थी।
रिकॉर्ड के शुरुआती 2,000 सालों (1000 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी तक) में अलास्का के इन इलाकों में आग लगने की घटनाएं बहुत ही दुर्लभ थीं। 1000 से 1200 ईस्वी के बीच मामूली हलचल जरूर देखी गई, जब मिट्टी सूखनी शुरू हुई थी, लेकिन उसके बाद अगले 700 सालों तक फिर से शांति रही। असली बदलाव की शुरुआत आधुनिक युग के साथ हुई।
1900 के आसपास आग की घटनाओं में फिर से बढ़ोतरी शुरू हुई, लेकिन 1950 के बाद तो जैसे रिकॉर्ड ही टूट गए। इस दौरान अलास्का की मिट्टी अपने इतिहास के सबसे सूखे दौर में पहुंच गई। मिट्टी के सूखने और वहां झाड़ियों (Woody Vegetation) के बढ़ने के कारण आग को ज्यादा ईंधन मिलने लगा, जिससे आग की तीव्रता और दायरा दोनों बढ़ गए।
वैज्ञानिकों ने केवल पुरानी मिट्टी पर ही भरोसा नहीं किया, बल्कि उसे आधुनिक सैटेलाइट तस्वीरों से भी मिलाया। सैटेलाइट डेटा ने पुष्टि की कि 1960, 1990 और 2000 के दशक में इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा आग लगी। यह तुलना साबित करती है कि हालिया दशकों में आग लगने की आवृत्ति (Frequency) काफी बढ़ गई है।
यूनिवर्सिटी ऑफ अलास्का के रैंडी फुलवेबर ने एक डराने वाली बात साझा की। उन्होंने बताया कि हालिया आग इतनी भीषण और गर्म होती है कि वह पीछे चारकोल के अवशेष भी कम छोड़ रही है। इसका मतलब है कि आग अब पहले से कहीं ज्यादा ईंधन जला रही है और जमीन की गहराई तक नुकसान पहुंचा रही है।
यह महत्वपूर्ण शोध यूनिवर्सिटी ऑफ अलास्का फेयरबैंक्स के 'टूलिक फील्ड स्टेशन' की वजह से संभव हो पाया। यहां दुनिया भर के विशेषज्ञ एक साथ मिलकर काम करते हैं। फुलवेबर के अनुसार, इस स्टेशन पर रिमोट सेंसिंग और पुराने पारिस्थितिकी तंत्र (Paleoecology) के विशेषज्ञों के मेल ने ही इतने बड़े रहस्य से पर्दा उठाने में मदद की है।