क्यों नेपाल को कभी गुलाम नहीं बना पाए अंग्रेज, जंग में मिली हार या फिर लड़े ही नहीं?

भारत में लगभग 200 साल तक राज करने वाले अंग्रेज, कभी नेपाल में शासन नहीं कर पाए। ये जानकारी अपने आप में हैरान कर देने वाली है कि आखिर भारत जैसे विशाल देश पर तो इंग्लैंड ने कब्जा कर लिया था, फिर वो कभी नेपाल पर कब्जा क्यों नहीं कर पाया? क्या नेपाल से इंग्लैड हार गया, नेपाल से इंग्लैंड डरता था या फिर अंग्रेज कभी नेपाल से लड़े ही नहीं? इन सवालों के जवाब इतिहास में दर्ज हैं, आइए जानते हैं।

Authored by: शिशुपाल कुमारUpdated Dec 29 2025, 13:49 IST
नेपाल और ब्रिटश साम्राज्यImage Credit : Wikimedia commons/Canva01 / 07

नेपाल और ब्रिटश साम्राज्य

ये सच है कि अंग्रेजों ने कभी नेपाल पर कब्जा नहीं किया, लेकिन नेपाल को छोड़ा भी नहीं। नेपाल और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच जंग भी हुई और अंग्रेज जीते भी, लेकिन अंग्रेज नेपाल में सीधे तौर पर शासन से दूर रहे। उसके कई कारण थे। अंग्रेजों के लिए नेपाल की जो वैल्यू थी, वो उतनी नहीं थी कि उसके लिए वो नेपाल से बैठकर शासन करते, जिसमें काफी धन भी खर्च होता, इसके बजाय अंग्रेजों ने दूसरा ही रास्ता अपनाया।

नेपाल में अंग्रेजों की कठपुतली सरकारImage Credit : Wikimedia commons/Canva02 / 07

नेपाल में अंग्रेजों की कठपुतली सरकार

नेपाल को सुगौली की संधि के जरिए अंग्रेजों ने इस कदर झुका लिया था, कि नेपाल में जो सरकार थी, वो एक तरह से अंग्रेजों की कठपुतली सरकार थी। अंग्रेज सरकार का एक प्रतिनिधि काठमांडू में मौजूद रहता था। नेपाल के शासक की स्थिति ये थी कि वो किसी अमेरिकी या यूरोपीय कर्मचारी को नियुक्ति भी नहीं कर सकते थे।

आंग्ल-नेपाल युद्ध (गोरखा युद्ध)Image Credit : Wikimedia commons/Canva03 / 07

आंग्ल-नेपाल युद्ध (गोरखा युद्ध)

आंग्ल–नेपाल युद्ध 1814 से 1816 के बीच ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गुरखा राज्य के बीच लड़ा गया। इसका मुख्य कारण सीमा-विस्तार और तराई क्षेत्रों पर नियंत्रण था। नेपाल ने अपने राज्य का विस्तार गढ़वाल, कुमाऊं, सिक्किम और तराई क्षेत्रों तक किया था, जबकि ब्रिटिश भी इन इलाकों पर प्रभाव स्थापित करना चाहते थे। इन क्षेत्रों पर नेपाल ने अंग्रेजों के समय में ही पिछले लगभग 25 वर्षों के दौरान विजय प्राप्त की थी।

जब अंग्रेजों से हार गया नेपालImage Credit : Wikimedia commons/Canva04 / 07

जब अंग्रेजों से हार गया नेपाल

नेपाल और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच जो युद्ध हुआ उसमें नेपाल की हार हुई। युद्ध 1814 में शुरू हुआ। ब्रिटिश सेना को प्रारंभिक चरण में गुरखा योद्धाओं की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। वीरता के प्रतीक के रूप में गोरखा सैनिकों की ख्याति इसी संघर्ष से व्यापक रूप से फैली। अंततः ब्रिटिश सैन्य संगठन, संसाधन और कूटनीति के सामने नेपाल को समझौते के लिए तैयार होना पड़ा।

सुगौली संधिImage Credit : Wikimedia commons/Canva05 / 07

सुगौली संधि

इस युद्ध में हार के बाद नेपाल को अंग्रेजों के सामने झुकना पड़ा। नेपाल को कुमाऊँ, गढ़वाल, तराई और सिक्किम जैसे बड़े हिस्से ब्रिटिशों को देने पड़े, जो उसने कुछ साल पहले जीते थे। नेपाल की सीमाएं काफी घट गईं। बदले में ब्रिटिशों ने नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और उसे स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने का वचन दिया। इसी के बाद ब्रिटिश सेना में गोरखा रेजिमेंट की भर्ती परंपरा भी स्थापित हुई।

भारत के क्रातिकारों से गद्दारी और नेपाल को ईनाम06 / 07

भारत के क्रातिकारों से गद्दारी और नेपाल को ईनाम

नेपाल कहने के लिए स्वतंत्र था, लेकिन वक्त-वक्त पर वो अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित करते रहा। 1857 की बगावत के दौरान नेपाल ने विद्रोहियों का समर्थन न करके ब्रिटिशों की मदद की। जंग बहादुर राणा ने ब्रिटिशों के अनुरोध पर विद्रोह दबाने के लिए गोरखा सैनिक भेजे। नेपाली सेना ने लखनऊ, अवध और गोंडा क्षेत्रों में ब्रिटिशों के साथ मिलकर क्रांतिकारियों के खिलाफ अभियान चलाया। नेपाल की इस सहायता से ब्रिटिशों को विद्रोह दबाने में काफी मदद मिली।

'गुलाम' नेपाल कागजों पर स्वतंत्र रहाImage Credit : Wikimedia commons/Canva07 / 07

'गुलाम' नेपाल कागजों पर स्वतंत्र रहा

इस तरह नेपाल एक तरह से गुलाम रहते हुए भी स्वतंत्र रहा। नेपाल ब्रिटिश नियंत्रण में नहीं था, पर 1816 की सुगौली संधि के बाद ब्रिटिश प्रभाव से प्रभावित था। 1846 के बाद राणा शासन स्थापित हुआ, जो ब्रिटिशों के प्रति सहयोगी रहा और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी बनाए रखी। 19वीं सदी के आरंभ से 1947 तक वह ब्रिटिश राजनीतिक प्रभाव में रहा। यह प्रभुत्व मुख्यतः सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक रूप में दिखा, न कि प्रत्यक्ष शासन के रूप में। भारत की आज़ादी के बाद ही नेपाल ब्रिटिश प्रभाव से पूरी तरह मुक्त राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ सका।

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