भारतीय सेना के पास फाइटर जेट नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण हैं युद्ध के समय भूमिका। आर्मी को जमीन पर युद्ध करना होता है, इसलिए उसे लड़ाकू विमान की जरूरत होती ही नहीं है। जहां सेना को हवाई हमले की जरूरत पड़ती है, वहीं वायुसेना उसके लिए खड़ा मिलती है या नौसेना के फाइटर जेट भी उसका साथ देते हैं।
भारत के पास ही नहीं दुनिया की किसी भी आर्मी के पास फाइटर जेट नहीं होते हैं। अमेरिका से लेकर रूस तक और चीन से लेकर इंग्लैंड तक की सेना हवाई हमले के लिए वायुसेना पर ही निर्भर रहती है।
अगर सेना के पास भी फाइटर जेट हों, तो संसाधनों और कमांड स्ट्रक्चर में दोहराव होगा। इससे समन्वय में दिक्कत आ सकती है। फाइटर जेट संचालन बेहद तकनीकी और विशेष प्रशिक्षण मांगता है। वायुसेना इसी क्षेत्र में विशेषज्ञ है, जबकि सेना की विशेषज्ञता जमीनी अभियानों में है।
हालांकि इंडियन आर्मी के पास फाइटर जेट्स नहीं होते हैं, लेकिन वो हवाई हमला कर सकती है, हालांकि इसका पैमाना छोटा होता है। सेना के पास हेलीकॉप्टर और ड्रोन जैसे साधन हैं, जो जमीनी अभियानों में सहायता करते हैं। इससे उसकी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।
इंडियन आर्मी के पास मुख्य रूप से AH-64E Apache अटैक हेलीकॉप्टर शामिल है, जिन्हें अमेरिका से खरीदा गया है। ये आधुनिक हेलीकॉप्टर टैंक रोधी मिसाइल, रॉकेट और मशीन गन से लैस होते हैं और दिन-रात हर मौसम में हमला करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा सेना को स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (LCH) प्रचंड भी मिले हैं। प्रचंड ऊंचाई वाले इलाकों, खासकर लद्दाख जैसे क्षेत्रों में ऑपरेशन के लिए उपयुक्त है। ये हेलीकॉप्टर सेना को जमीनी युद्ध में तेज और सटीक हवाई समर्थन प्रदान करते हैं।
नौसेना के पास फाइटर जेट होते हैं, लेकिन वायुसेना जितना नहीं। फाइटर जेट खरीदना, उनका रखरखाव और पायलट ट्रेनिंग बेहद महंगी होती है। एक ही शाखा के पास यह क्षमता रखने से खर्च और प्रबंधन बेहतर रहता है।
समुद्र में वायुसेना की पहुंच सीमित हो जाती है, समुद्र के बीच वायुसेना के हवाई अड्डे उपलब्ध नहीं होते। समुद्र की ओर से किसी भी दुश्मन पर हमला करने का काम नौसेना का होता है, जो अपने एयरक्राफ्ट कैरियर के सहारे दुश्मन देश को न सिर्फ पानी में घेर सकती है, बल्कि अपने फाइटर जेट्स के सहारे हवाई हमले भी कर सकती है।