Sawan Somwar Puja Vidhi: सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित होता है। आज यानी 24 अगस्त को सावन का आखिरी सोमवार है। सावन के आखिरी सोमवार का विशेष महत्व होता है। इस खास मौके पर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए पूजा-पाठ किए जाते हैं। अगर आप इस दिन घर पर ही भगवान शिव की पूजा करना चाहते हैं, तो कुछ आसान नियमों के साथ पूजा कर सकते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई शिव आराधना से मन को शांति मिलती है और भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यहां से आप सावन के आखिरी सोमवार की पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजा की विधि, व्रत की विधि, पूजा सामग्री, मंत्र, कथा, आरती, उद्यापन की विधि समेत सारी जानकारी ले सकते हैं।
सावन सोमवार पूजा विधि (Sawan Somwar Puja Vidhi)
सूर्योदय से पूर्व उठ जाएं और नहाकर स्वच्छ कपड़े पहन लें। इसके बाद शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करें। अगर आपके घर में शिवलिंग है तो उसी का अभिषेक करें। इसके बाद महादेव को सफेद चंदन लगाएं और उन्हें भांग, धतूरा, बिल्वपत्र, आंकड़ा आदि चीजें अर्पित करें। फिर भगवान की प्रतिमा के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाएं। इसके बाद सावन सोमवार व्रत की कथा सुनें और भगवान शिव की आरती करें। अंत में भगवान को भोग लगाएं। इस बात का ध्यान रखें कि व्रत वाले दिन सुबह-शाम दोनो समय भगवान शंकर की पूजा करनी है। शाम के समय भगवान शिव की पूजा के बाद व्रत खोल लें। इस समय आप चाहें तो बिना नमक का अन्न भी ग्रहण कर सकते हैं।
सावन सोमवार व्रत विधि (Sawan Somwar Vrat Vidhi)
सावन सोमवार व्रत में सुबह मंदिर जाकर शिव परिवार की विधि विधान पूजा करें। फिर पूरे दिन बिना अन्न के उपवास रखें। इस दिन शिवलिंग पर बेलपत्र जरूर चढ़ाएं। शाम को सावन सोमवार व्रत की कथा सुनने के बाद मीठे भोजन का सेवन करें।
सावन सोमवार पूजा सामग्री (Sawan Somwar Puja Samagri)
शिव-पार्वती प्रतिमा
फूल
दक्षिणा
पूजा के बर्तन
कुशासन
दही
पंच रस
इत्र
गंध
रोली
बिल्वपत्र
धतूरा
भांग
बेर
पंच फल पंच मेवा
रत्न
आम्र मंजरी
मंदार पुष्प
गाय का कच्चा दूध
कपूर
धूप
दीप
रूई
मलयागिरी
चंदन
शुद्ध देशी घी
मौली
जनेऊ
पंच मिष्ठान्न
शहद
गंगाजल
पवित्र जल
मां पार्वती की श्रृंगार सामग्री
सावन सोमवार व्रत कथा (Sawan Somwar Vrat Katha)
स्कन्द पुराण अनुसार एक बार सनत कुमार भगवान शिव से पूछते हैं कि प्रभु आपको सभी महीनों में सावन ही सबसे ज्यादा प्रिय क्यों हैं। तब भगवान शिव कहते हैं मुझसे विवाह करने के लिए देवी सती ने कठोर तपस्या की और यहां तक कि उन्हें अपने पिता के भी विरुद्ध जाना पड़ा। मुझसे विवाह के बाद जब देवी सती ने अपने पिता के घर पर मेरा अपमान होते हुए देखा तो उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद सती का जन्म पर्वत राज हिमालय की पुत्री के रूप में हुआ और उनका नाम देवी पार्वती रखा गया। इस जन्म में भी उन्होंने मुझसे विवाह करने के श्रावण माह में निराहार रहकर कठोर तपस्या की। जिसके फलस्वरूप मैंने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। कहते हैं इसलिए आज भी कई लोग इसी परंपरा का पालन करते हुए अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए सावन सोमवार व्रत रखते हैं। विशेष तौर पर कुंवारी कन्याएं भगवान शिव जैसा पति पाने के लिए ये व्रत रखती हैं।
शिव जी की आरती (Shiv Ji Ki Aarti)
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥
