ऐसा किसी ने सोचा था कि एक दिन NATO के देश ही एक दूसरे के खिलाफ हथियार उठा लेंगे?

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिस उद्देश्य से NATO (The North Atlantic Treaty Organization) का गठन हुआ था, आज वो बिखरता दिख रहा है। नाटो का गठन का मुख्य उद्देश्य था, इसके सदस्यों की सुरक्षा, किससे- मुख्य रूप से सोवियत संघ से यानि कि आज के रूस से। इसके सदस्य देशों के बीच करार हुआ कि अगर कोई देश उनपर हमला करता है तो बाकी सभी उसके साथ खड़े होंगे और दुश्मन का मुकाबला करेंगे। नाटो की अगुवाई में मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोपीय देश रहे। लेकिन आज अमेरिका और यूरोप ही एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हो गए हैं, वजह है ग्रीनलैंड। हालांकि ग्रीनलैंड से पहले भी ऐसे कई मुद्दे सामने आए, जहां NATO देश के सदस्य अमेरिका के खिलाफ मुखरता से खड़े रहे, लेकिन अब वो अमेरिका के खिलाफ हथियार उठाने लगे हैं।

Authored by: शिशुपाल कुमारUpdated Jan 15 2026, 09:33 IST
अमेरिका के खिलाफ क्यों हुए NATO के कई सदस्य देश?Image Credit : AP01 / 07

अमेरिका के खिलाफ क्यों हुए NATO के कई सदस्य देश?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब से सत्ता में आए हैं, उनकी धमकियों का दौर जारी है, ट्रंप खोखली धमकी नहीं दे रहे हैं, बल्कि दिखा भी दे रहे हैं कि वो कुछ भी कर सकते हैं, जिसमें ईरान पर हमले से लेकर वेनेजुएला तक पर हमला शामिल है। अब ट्रंप ग्रीनलैंड के खिलाफ एक्शन की रोज धमकी दे रहे हैं, लग रहा है आज नहीं तो कल अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने में मिला लेगा। इसी को लेकर अब यूरोप, अमेरिका के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।

अमेरिका के खिलाफ कौन-कौन से नाटो देश?Image Credit : AP02 / 07

अमेरिका के खिलाफ कौन-कौन से नाटो देश?

अमेरिका के खिलाफ शुद्ध रूप से डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स, कनाडा सामने आ चुके हैं। ब्रिटेन भी इस मामले में अमेरिका के खिलाफ जाते दिख रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो NATO किसी भी दिन टूट सकता है।

कौन-कौन से देश ग्रीनलैंड हथियार भेज रहे हैं?Image Credit : AP03 / 07

कौन-कौन से देश ग्रीनलैंड हथियार भेज रहे हैं?

ग्रीनलैंड में हाल के दिनों में नाटो देशों की सैन्य मौजूदगी बढ़ी है। ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और वहां सबसे बड़ी भूमिका खुद डेनमार्क की है, जिसने पहले से ही सैनिकों, नौसेना और निगरानी संसाधनों की तैनाती बढ़ाई है। इसके अलावा नॉर्वे, स्वीडन, जर्मनी और फ्रांस जैसे नाटो देशों ने भी सीमित संख्या में सैनिक, सैन्य अधिकारी, टोही टीमें या सहयोगी बल भेजने का फैसला किया है। कुछ रिपोर्टों में नीदरलैंड्स और कनाडा के योगदान का भी जिक्र मिलता है, जो लॉजिस्टिक्स, निगरानी या संयुक्त मिशन के रूप में शामिल हैं।

यूक्रेन को लेकर भी नाटो में मतभेदImage Credit : AP04 / 07

यूक्रेन को लेकर भी नाटो में मतभेद

यूक्रेन युद्ध को लेकर नाटो देशों के बीच एकजुटता दिखती जरूर है, लेकिन इसके भीतर कई स्तरों पर मतभेद भी मौजूद हैं। सबसे बड़ा मतभेद युद्ध की तीव्रता और लक्ष्य को लेकर है। अमेरिका, ब्रिटेन और पोलैंड जैसे देश यूक्रेन को लगातार और भारी सैन्य मदद देने के पक्ष में रहे हैं। जबकि जर्मनी और फ्रांस जैसे देश शुरुआत से ही संतुलित रुख अपनाते रहे हैं और सैन्य सहायता के साथ-साथ कूटनीतिक समाधान की बात करते रहे हैं। यूक्रेन की नाटो सदस्यता को लेकर भी मतभेद साफ दिखाई देते हैं। बाल्टिक देश और पोलैंड जैसे सदस्य चाहते हैं कि यूक्रेन को जल्द से जल्द नाटो में शामिल किया जाए, जबकि अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस इस मुद्दे पर सावधानी बरतते हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे रूस के साथ सीधा युद्ध छिड़ सकता है।

क्या टूट जाएगा नाटो?Image Credit : AP05 / 07

क्या टूट जाएगा नाटो?

वर्तमान हालात में नाटो के टूटने की संभावना बहुत कम है, लेकिन यह भी सच है कि गठबंधन के भीतर दबाव, मतभेद और असहजता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ी हुई है। यानी नाटो संकट में है। मेरिका और यूरोपीय देशों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि सुरक्षा का बोझ कौन उठाए। अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी रक्षा पर ज्यादा खर्च करे, जबकि कई यूरोपीय देश अब भी पूरी तरह तैयार नहीं हैं।

नाटो में अब सर्वसम्मति नहींImage Credit : AP06 / 07

नाटो में अब सर्वसम्मति नहीं

हंगरी और तुर्की जैसे देश कई फैसलों में अड़ंगा लगाते रहे हैं, जिससे नाटो की सर्वसम्मति आधारित व्यवस्था धीमी और कमजोर नजर आती है। अमेरिका की घरेलू राजनीति भी एक अनिश्चितता का कारण है, क्योंकि अगर भविष्य में अमेरिका का रुख ज्यादा अलगाववादी हुआ तो नाटो पर उसका असर पड़ सकता है।

नाटो का भविष्यImage Credit : AP07 / 07

नाटो का भविष्य

आने वाले समय में नाटो की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका और यूरोप आपसी जिम्मेदारियों को कैसे संतुलित करते हैं और यूक्रेन युद्ध का अंत किस तरह होता है। नाटो का फोकस भी बदल रहा है। पहले यह मुख्य रूप से रूस-केंद्रित था, लेकिन अब चीन, साइबर युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष सुरक्षा और आर्कटिक क्षेत्र जैसे नए आयाम इसकी रणनीति में शामिल हो रहे हैं। इससे नाटो एक क्षेत्रीय सैन्य गठबंधन से धीरे-धीरे वैश्विक सुरक्षा ढांचे की ओर बढ़ सकता है, हालांकि इस पर सभी सदस्य देश एकमत नहीं हैं।

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