छोटे बच्चों में यह आदत होना कोई असामान्य बात नहीं है और शुरुआती दौर में कई बच्चे बड़े होने के साथ इस आदत को खुद-ब-खुद छोड़ देते हैं। हालांकि, अगर यह समस्या रोजाना होने लगे तो पेरेंट्स को इसके पीछे के कारणों की जांच करनी चाहिए।
बच्चों के दांत किटकिटाने के पीछे कोई एक सटीक वजह नहीं होती है। हालिया शोध बताते हैं कि यह नींद के पैटर्न, आनुवंशिकी, या जबड़े की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका तंत्र से जुड़ी हो सकती है।
कई बार पेरेंट्स को लगता है कि दांत निकलते समय मसूड़ों की खुजली के कारण बच्चे ऐसा करते हैं। हालांकि, केवल टीदिंग को ही इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह प्रक्रिया लंबे समय तक चल सकती है।
नींद की गुणवत्ता और सांस लेने की आदतें भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। जो बच्चे सोते समय खर्राटे लेते हैं या मुंह खोलकर सांस लेते हैं, उनमें दांत पीसने की संभावना काफी ज्यादा पाई जाती है।
कभी-कभार दांत पीसने से बच्चों के दूध के दांतों को नुकसान नहीं पहुंचता है। लेकिन अगर यह आदत बहुत तेज और लगातार बनी रहे, तो इससे दांतों के घिसने या चपटे होने का खतरा पैदा हो सकता है।
पेरेंट्स को डॉक्टर या डेंटिस्ट से तब संपर्क करना चाहिए जब बच्चे के दांतों में घिसावट दिखे या वह सुबह उठकर जबड़े और चेहरे में दर्द की शिकायत करे। इसके अलावा, सोते समय सांस रुकने या तेज खर्राटों के लक्षण दिखने पर तुरंत सलाह लेनी चाहिए।
बच्चों की इस समस्या को हल करने के लिए खुद से कोई माउथगार्ड या डेंटल डिवाइस न खरीदें। इसके बजाय, डेंटिस्ट से नियमित जांच करवाएं और डॉक्टर की देखरेख में ही सही और सुरक्षित मार्गदर्शन प्राप्त करें।