मनोविज्ञानके अनुसार, कई बार थकावट की वजह आपका ऑफिस या काम का बोझ नहीं होता। दरअसल हम उन लोगों से मानसिक रूप से थक चुके होते हैं, जो हमारे आसपास मौजूद हैं। ऐसे में हमें काम से छुट्टी लेने के बजाय कुछ समय के लिए लोगों और अपने सोशल सर्किल से दूरी बनाने की जरूरत होती है। आइए जानते हैं कब ऐसा करने की जरूरत पड़ती है:
पहला इशारा यह है कि जब आप लोगों के बीच होते हैं, तो खुद को पूरी तरह से खाली और भावनात्मक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं। अपनों या दोस्तों के साथ बिताया समय आपको खुशी देने के बजाय मानसिक तनाव देने लगता है। बातचीत खत्म होते ही आपको लगता है कि आपकी सारी ऊर्जा निचोड़ ली गई है।
दूसरा संकेत है छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ होना या बात-बात पर गुस्सा आना। जब कोई आपसे सामान्य सवाल भी पूछता है, तो आपको गुस्सा आने लगता है या उनका बोलना भारी लगने लगता है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आपकी सहनशक्ति का स्तर खत्म हो चुका है और आपका दिमाग और लोगों को झेलने के लिए तैयार नहीं है।
तीसरा इशारा यह है कि आप लोगों के मैसेज और कॉल का जवाब देने से बचने लगते हैं। फोन की घंटी बजते ही आपका मन घबराने लगता है और आप जवाब देने को टालते रहते हैं। जब सामाजिक संपर्क आपको एक जिम्मेदारी या बोझ जैसा महसूस होने लगे, तो समझ जाएं कि आपको सोशल डिटॉक्स की जरूरत है।
चौथा लक्षण है खुद को अकेला महसूस करना, भले ही आप भीड़ के बीच हों। जब आप अंदर से इतने थके होते हैं कि लोगों से जुड़ नहीं पाते, तो आसपास ढेरों लोग होने के बावजूद आप उनसे कटा हुआ महसूस करते हैं। यह अहसास बताता है कि आप शारीरिक रूप से तो मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से वहां से दूर जा चुके हैं।
पांचवां इशारा यह है कि आप अपनी बातें या भावनाएं साझा करना बंद कर देते हैं। आपको लगता है कि अपनी बात किसी को समझाने में बहुत ऊर्जा खर्च होगी, इसलिए आप चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। जब बातचीत में आपका मन पूरी तरह से लगना बंद हो जाए, तो यह मानसिक दूरी बनाने का सीधा संकेत है।
छठा और सबसे अहम इशारा यह है कि अकेले रहने पर ही आपको सुकून और शांति मिलती है। जब एक बंद कमरे में बिना किसी की मौजूदगी के आपको राहत महसूस हो, तो इसका मतलब है कि आपको थोड़े समय के लिए दुनिया से दूरी बना लेनी चाहिए। कुछ दिन अकेले बिताकर खुद को समझें और अपनी मानसिक ऊर्जा को फिर से रिचार्ज करें।