हमारा दिमाग और पेट एक-दूसरे से बेहद गहराई से जुड़े हुए हैं। मेडिकल साइंस में पेट को इंसान का 'दूसरा दिमाग' भी कहा जाता है। जब दिमाग में कोई तनाव या हलचल होती है, तो उसका सीधा असर हमारे पाचन तंत्र पर दिखाई देने लगता है।
जब आप तनाव में होते हैं, तो शरीर 'फाइट या फ्लाइट' मोड में चला जाता है। इस स्थिति में दिमाग तनाव से निपटने के लिए शरीर का ज्यादातर खून मांसपेशियों और दिल की तरफ भेज देता है। इसके कारण पेट की तरफ खून का बहाव कम हो जाता है और पाचन क्रिया धीमी हो जाती है।
तनाव के दौरान शरीर में कार्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर तेजी से बढ़ता है। ये हार्मोन्स पेट के एसिडिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं। यही वजह है कि ज्यादा चिंता या तनाव के समय पेट में जलन, एसिडिटी, गैस और खट्टी डकारें आने की समस्या बढ़ जाती है।
दिमाग और आंतों के बीच का यह संपर्क 'गट-ब्रेन एक्सिस' कहलाता है। जब आप मानसिक तनाव से गुजरते हैं, तो आंतों की मांसपेशियां या तो बहुत तेज सिकुड़ने लगती हैं या बिल्कुल सुस्त पड़ जाती हैं। इसी कारण से कई लोगों को तनाव में तुरंत दस्त हो जाते हैं या फिर कब्ज की शिकायत हो जाती है।
हमारे पेट में अरबों गुड बैक्टीरिया होते हैं, जो खाना पचाने और इम्युनिटी बढ़ाने का काम करते हैं। लगातार तनाव में रहने से पेट के इन अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ने लगता है। इस असंतुलन से पेट में ऐंठन, ब्लोटिंग और भारीपन महसूस होने लगता है।
लंबे समय तक रहने वाला तनाव 'इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम' जैसी गंभीर पेट की बीमारियों का कारण बन सकता है। आईबीएस के मरीजों में मानसिक तनाव के कारण पेट दर्द, मरोड़ और दस्त या कब्ज की समस्या बार-बार होने लगती है, जिससे रोजमर्रा का जीवन प्रभावित होता है।
इसलिए अगर आप अपने पेट को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने दिमाग का तनाव कम करना जरूरी है। योग, ध्यान, गहरी सांस लेने के व्यायाम और पर्याप्त नींद की मदद से आप तनाव को नियंत्रित कर सकते हैं। जब आपका दिमाग शांत रहेगा, तो पेट का बवाल भी अपने आप खत्म हो जाएगा।