संजय डहरिया, छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बेलटुकरी गांव के रहने वाले है। वह एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। बचपन से आर्थिक तंगी में देखने वाले संजय का सपना देश की प्रशासनिक सेवा में जाना और समाज के लिए कुछ करना था। वह बचपन से आईएएस बनने का सपना देख रहे थे। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उनके माता-पिता ने उनकी पढ़ाई में किसी प्रकार की कमी नहीं रखी। उन्होंने शुरूआती पढ़ाई बेलटुकरी गांव से ही पूरी की और उसके बाद नवोदय विद्यालय से 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की। उसी समय उन्होंने आईएएस बनने का सपना देखा।
संजय का जीवन सही चल रहा था, फिर अचानक उनके जीवन ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने न केवल संजय को बल्कि उनके पूरे परिवार को झकझोर के रख दिया। 2012 में उन्हें पता लगा कि उन्हें कान के पास कैंसर है। इस बीमारी की जानकारी मिलने के बाद मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में उनका इलाज शुरू हुआ, जो कई वर्षों तक चला।
जीवन की इस कठिन लड़ाई के बीच संजय का आईएएस अधिकारी बनने का सपना भी कहीं खो सा गया। संजय ने करीब 7 साल तक कैंसर की कठिन लड़ाई लड़ी। इस दौरान उन्हें कई ऑपरेशन और अन्य ट्रीटमेंट से होकर गुजरना पड़ा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे उनके माता-पिता ने बेटे के इलाज में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं छोड़ी।
कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से 7 साल लड़ने के बाद 2018-19 के बाद संजय इस बीमारी से पूरी तरह से ठीक हो गए। और इसी के साथ उनका आईएएस बनने का सपना भी जी उठा। उन्होंने तय किया की वह यूपीएससी की तैयारी करेंगे और इस परीक्षा को पास कर दिखाएंगे।
2022 में संजय ने रायपुर में एक छोटा कमरा किराए पर लिया और यहां रहकर यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू की। उन्होंने सुबह-शाम करीब 4 साल तक यूपीएससी की परीक्षा के लिए जमकर पढ़ाई की।
चार साल की उनकी मेहनत तब रंग लाई, जब उन्होंने 2025 में यूपीएससी की परीक्षा दी और 946वीं रैंक हासिल की। 100 स्क्वायर फीट के कमरे से शुरू हुआ यूपीएससी का सफर और संजय की मेहनत सफल होगई।
संजय ने एक इंटरव्यू में उनकी सफलता का पूरा श्रेय माता-पिता के त्याग और परिवार के समर्थन को दिया। उन्होंने बताया कि उनकी इस सफलता के पीछे माता-पिता की बड़ी भूमिका है। अब वह प्रशासनिक सेवा में जाकर समाज की बेहतरी के लिए काम करेंगे।