गत चतुर्दशी को चित्तौड़गढ़ के सांवलिया जी मंदिर के भंडार खोले गए। भंडार से निकली दान राशि की गणना चार चरणों में पूरी की गई। इसके बाद भंडार, भेंट कक्ष और ऑनलाइन से इस महीने प्राप्त राशि 29 करोड़ 32 लाख 4 हजार रुपये रही। पिछले साल इसी अमावस्या के भंडार से करीब 17 करोड़ 73 लाख रुपये एवं ऑनलाइन भेंट कक्ष से 5 करोड़ 38 लाख रुपये की प्राप्ति हुई थी। इस तरह इस साल करीब 6.21 करोड़ रुपये अधिक प्राप्त हुए।
इस महीने भंडार से 22 करोड़ 80 लॉख 69 हजार 395 रुपये नकदी, 1250 ग्राम सोना और 44 किलो 400 ग्राम चांदी की प्राप्ति हुई। दफ्तर और भेंटकक्ष में नकद एवं ऑनलाइन 6 करोड़ 51 लाख 35 हजार 525 रुपये, 535 ग्राम 910 मिलीग्राम सोना और 55 किलो 444 ग्राम चांदी भेंटकक्ष में जमा हुई।
चित्तौड़गढ से उदयपुर की ओर NH76 पर 28 किमी दूर प्रसिद्ध श्री सांवलिया जी प्राकट्य स्थल मंदिर है। यहां हर साल हजारों यात्री आते हैं। श्री सांवलिया जी प्राकट्य स्थल नाम से प्रसिद्ध इस स्थान से सांवलिया सेठ की 3 प्रतिमाओं के उद्गम का अपना इतिहास है। सन 1840 में तत्कालीन मेवाड राज्य में उदयपुर से चित्तौड़ जाने के लिए बनने वाली कच्ची सड़क के निर्माण में बागुन्ड गांव में बाधा बन रहे बबूल के पेड़ को काटकर खोदने पर वहा से भगवान कृष्ण की सांवलिया स्वरूप 3 प्रतिमाएं निकली।
किवंदती है कि ये मूर्तिया नागा साधुओं द्वारा अभिमंत्रित थीं, जिनको आक्रमणकारियों से बचाने के लिए यहां जमीन में छिपा दिया गया। कालान्तर में वहां बबूल का एक पेड़ जम गया। पेड़ की जड़ निकालते समय वहां भूगर्भ में छिपे श्री सांवलियाजी की सुंदर और मनमोहक तीन प्रतिमाएं एक साथ देखकर मजदूर व स्थानीय व्यक्ति बड़े आनंदित हुए। भादसोड़ा में सुथार जाति के अत्यंत ही प्रसिद्ध गृहस्थ संत पुराजी भगत रहते थे। उनके निर्देशन में इन मूर्तियों की सार संभाल की गयी तथा उन्हें सुरक्षित रखा गया।
1978 में यहां विशाल जनसमूह की उपस्थिति में मंदिर पर ध्वजारोहण किया गया। 1961 से मंदिर के निर्माण, विस्तार व सोंदर्यकरण का जो कार्य शुरू हुआ है, वह आज तक चल रहा है। इस स्थल पर अब एक अत्यंत ही खूबसूरत एवं विशाल मंदिर बन चुका है। 36 फुट ऊंचा एक विशाल शिखर बनाया गया है जिस पर फरवरी, 2011 में स्वर्णजडित कलश व ध्वजारोहण किया गया।
1961 से ही इस प्रसिद्ध स्थान पर देवझूलनी एकादशी विशाल मेले का आयोजन हो रहा है। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी, एकादशी व द्वादशी को 3 दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। प्रतिमाह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सांवलियाजी का दानपात्र (भंडार) खोला जाता है और अगले दिन यानी अमावस्या को शाम को महाप्रसाद का वितरण किया जाता है।