सुल्तान के बाद इस रेस्टोरेंट को उनके बेटे हसन संभालने लगे। 2010 में सुल्तान के पोते हयात ने रेस्टोरेंट की कमान अपने हाथ में ली।
अपनी लोकेशन के चलते यह रेस्टोरेंट नौकरशाहों और राजनेताओं के लिए मीटिंग सेंटर रहा है। अहदू की शुरुआत महाराजा हरि सिंह के कहने पर की गई थी, जो जम्मू-कश्मीर रियासत के अंतिम राजा थे।
1910 के दशक में उन्होंने अपने अकाउंट सेक्शन में काम करने वाले अहद (सुल्तान के पिता) को सुझाव दिया कि वह अपने बेटे को ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कलकत्ता (अब कोलकाता) में चलाई जाने वाली एक हलवाई की दुकान पर खाना पकाना सीखने के लिए भेजें।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार हयात के अनुसार एक बार अपने बेटे करण सिंह के जन्मदिन पर महाराजा ने दो केक मंगवाए थे - एक दिल्ली से मंगवाया गया और दूसरा अहदू से। मेहमानों ने उनके दादा का केक पसंद किया।
1920 के दशक तक, बेकरी को एक रेस्टोरेंट में बदल दिया गया। यह घाटी में पहला रेस्टोरेंट था जो कश्मीरी वाज़वान या पारंपरिक शादी की दावत ऑफर करता था।
जोमैटो की वेबसाइट के अनुसार यहां दो लोगों के खाने का खर्च करीब 1500 रु है। यहां नॉर्थ इंडियन के साथ-साथ साउथ इंडियन खाना भी मिलता है। मेन्यू में मटन सीख कबाब (170 रु), चिकन सीख कबाब (170 रु), मटन टिक्का (225 रु), चिकन टिक्का (225 रु), चिकन/मटन सूप (150 रु), मशरूम सूप (125 रु), मुगलई चिकन (370 रु) और पालक कोरमा (380 रु) शामिल हैं।