प्रवीण ने कम्प्यूटर की अपनी एक्सपर्टाइज को कचरे का प्रबंधन (Waste Management) करने में लगाया। पर समस्या ये थी कि उनके पास मकसद तो था, मगर जानकारी, पैसा और तरीका नहीं था।
उन्होंने शहर भर से कचरा बीनने वालों को इकट्ठा किया। वहीं उनकी पत्नी प्रगति ने अंबिकापुर में आदिवासी महिलाओं के स्वयं सहायता समूह के बीच रह कर कचरा प्रबंधन मॉडल का अध्ययन किया।
फिर प्रवीण ने 'गार्बेज क्लीनिक' नाम से एक वेंचर शुरू किया। अब उनका ये वेंचर घरों और कई अन्य जगहों से कचरा इकट्ठा करता है। फिर उसे रीसाइकिल करके खाद, टाइल्स, कुर्सी, टेबल और इसी तरह के अन्य सामान बनाता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार गार्बेज क्लीनिक का सालाना टर्नओवर करोड़ों में है। वहीं गार्बेज क्लीनिक ने 500 से अधिक लोगों को रोजगार भी दे रखा है।
खास बात ये है कि उन्होंने बहुत सारे भीख मांगने वालों, अकेली बेसहारा महिलाओं और कचरा बीनने वाले लोगों को एक महीने की ट्रेनिंग दी और उन्हें अपने वेंचर से जोड़कर कचरा प्रबंधन में एक प्रोफेशनल बना दिया।