सावन दस्तक दे चुका है। ये मौसम अपने साथ ना जाने कितने ही रंग लेकर आता है। बारिश में भीगे ये सारे रंग हर इंसानी एहसास का मजमून होती हैं। सावन में आप अगर पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार जाएंगे तो एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। यहां के गांवों में सावन की आमद के साथ ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते हैं। नई औरतें और लड़कियां इकट्ठा होती हैं। झूला झूलती हैं। नाच गाना होता है। सावन की भीगी फुहारों का जश्न मनाया जाता है।
हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि सावन के इस जश्न में महिलाएं जो गीत गाती हैं वो दर्द और इंतजार की स्याही से लिखे होते हैं। इनमें सावन की खुशी कम और किसी अपने के बिछड़ने का दर्द ज्यादा होता है। इन गीतों को कजरी कहा जाता है। यहां ये सवाल उठना लाजमी है कि आखिर सावन के सेलिब्रेशन में क्यों सजते हैं सूनेपन के सुर? इस सवाल का जवाब जानने से पहले जानिए कि कजरी आखिर हैं क्या।
कजरी क्या है?
कजरी पूर्वी यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में गाया जाने वाला एक लोकप्रिय लोकगीत है। मिर्जापुर को कजरी का जनक कहा जाता है। कजरी बनारस में जवान हुई और फिर जौनपुर, गाजीपुर, चंदौलू, बलिया होते हुए आसपास के बड़े भोजपुरी समाज का हिस्सा बन गई।
'कजरी' शब्द के बारे में माना जाता है कि यह काजल या कजरा से निकला है। सावन के काले बादल, आंखों का काजल और विरह की उदासी। इन सबका रंग एक ही है। शायद इसलिए इस लोकगीत का नाम भी कजरी पड़ा।

कजरी बिना अधूरा माना जाता है सावन
सूनेपन का गीत कैसे बना सावन का सेलिब्रेशन?
आज से करीब डेढ़-दो सौ साल पीछे के हिंदुस्तान की कल्पना कर के देखिए। तब भोजपुरी समाज के ज्यादातर मर्द कमाने दूर दराज जाया करते थे। उन दिनों साल-दो साल में ही एक बार घर आ पाना होता था। सावन में तो हाल और बुरा हो जाता। बरसात शुरू होते ही रास्ते बंद हो जाते थे। नदियां उफान पर होती थीं। सफर करना कठिन हो जाता था।
इन सबके बीच गांव में उन पुरुषों की राह तकती उनकी पत्नियां सावन को कोसती रहतीं। चारों तरफ हरियाली होती, लेकिन उनके मन का सूखापन खत्म ही नहीं होता। बादल आते थे, लेकिन उनके साजन नहीं आते। यहीं से कजरी के सबसे बड़े भाव विरह ने जन्म लिया।
हरे रामा सावन बीता जाए, सजन नहीं आए रे हरी
बदरा घिर आए अंधियारी, सजन नहीं आए रे हरी
हरे रामा झिरझिर बरसे बदरिया, तरसे मोरा जियरा
घर-आंगन सुनसान मोरा, कोई न धीर बंधाए रे हरी..
कजरी को सिर्फ प्रेम और विरह का गीत समझना उसकी दुनिया को बहुत छोटा कर देना होगा। सच तो यह है कि कजरी में भोजपुरी के ग्रामीण समाज का पूरा जीवन बसता है। इसमें प्रेम है, जुदाई है, लेकिन इसके साथ मां-बेटी का अपनापन भी है। नई दुल्हन का अकेलापन है। खेतों में हरियाली की उम्मीद है। परिवार की भावनाएं हैं और मौसम के साथ बदलती जिंदगी की रूह भी है।
पूर्वांचल के गांवों में एक समय ऐसी परंपरा थी कि सावन के महीने में विवाहित बेटियों को मायके बुलाया जाता था। बारिश, झूले और तीज-त्योहार तभी पूरे माने जाते थे, जब बेटी कुछ दिन अपने बचपन के घर में बिताए। लेकिन हर स्त्री इतनी खुशकिस्मत नहीं होती थी। कई बार परिस्थितियां उसे ससुराल में ही रोक लेती थीं। तब उसके मन की बेचैनी कजरी बनकर बाहर आती थी। इसकी एक बानगी इस मशहूर कजरी में देखिए:
एक तौ नैहर दूर बसत है, दूजे ससुइया दारुन रामा
बीच में नदिया बहे री अपार, कसके बरसे बदरिया रामा,
बाबूजी मोरे भेजल नाईंया, भइया दीन्हे ना पैग़ाम रामा
कैसे जियरा धीर धरावूं, सूना लागे सजनवा का धाम रामा,
सावन मास उमड़ि घिर आईल, झूला पड़ल कदम्ब की छोंह रामा
याद आवत बा मोरा बबुलवा, नैनवा भरि आवत मोरे दोव रामा,
सास गारी देवत बाड़ी, ननदी बोलत बाड़ी कड़ुवा बोल रामा
कइसे सुधि लेईं हम माई के, जियरा उठाता हिलोरो हिलोरो रामा..
इसी तरह के ढेर सारी कजरी में कोई विवाहित स्त्री अपने पति से बड़ी मासूमियत से कहती है कि सावन आ गया है, अब मुझे मायके भेज दीजिए। इस तरह के कजरी गीतों में अपने बचपन, मां की गोद, सहेलियों और उस दुनिया में लौटने की इच्छा होती है, जहां वह बिना किसी जिम्मेदारी के खुलकर जीती थी।

औरतों के विरह का सुर बन गई कजरी
इसके ठीक उलट कजरी उन शादीशुदा लड़कियों का दर्द भी बयां करती है जो सावन को अपने साजन के साथ जीना चाहती हैं। उन्हें इंतजार रहता कि सावन से पहले गवना तो हो ही जाएगा। लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो यही सावन उन्हें डसने लगता। यही दर्द इस कजरी में अपने नैहर से नाराजगी बनकर कजरी के गीत में सज जाता है।
तरसत जियरा हमार नैहर में
बाबा हठ कीनॊ, गवनवा न दीनो
बीत गइली बरखा बहार नैहर में
फट गई चुन्दरी, मसक गई अंगिया
टूट गइल मोतिया के हार, नैहर में
कहत छ्बीले पिया घर नाही
नाही भावत जिया सिंगार, नैहर में..
कुछ कजरियों में वह बादलों से शिकायत करती है कि तुम तो हर साल लौट आते हो, लेकिन मेरा संदेश लेकर कोई नहीं आता। कहीं वह पपीहे से अपने मन की बात कहती है, तो कहीं कृष्ण को अपना सखा मानकर उनसे अपनी पीड़ा साझा करती है।
कवना दूर देश से आके बदरा बरस गईल,
तहरा एगो झलक खातिर नयना तरस गईल
सावन के बहार रहे बरखा के फुहार रहे
बिरह में बरसे मोर नयनवा पल-पल प्यास रे हरी..
कजरी महज लोकगीत नहीं, स्त्री मन की हर वो आवाज है जिसे वो खुलकर नहीं बोल पाती। दूसरी तरफ इसी कजरी में एक किसान परिवार की यह उम्मीद भी है कि सावन की बारिश के साथ खेत लहलहाएंगे और जीवन फिर से मुसकुराएगा। यही बहुरंगी भाव कजरी को भारतीय लोक संगीत की सबसे संवेदनशील परंपराओं में शामिल करते हैं।
मिर्जापुर में जन्मी और बनारस में जवान हुई कजरी
पूर्वांचल में एक कहावत है- सावन बिना कजरी और मिर्जापुर बिना कजली महोत्सव अधूरा है। कजरी लोकगीतों का जन्म मिर्जापुर में ही हुआ। मिर्जापुर में हर साल कजली महोत्सव आयोजित किया जाता है। यह परंपरा कई पीढ़ियों पुरानी मानी जाती है। लोग रातभर कजरी गाते हैं।
एक समय था जब मिर्जापुर में ही कजरी गीत सुनाई देते थे। लेकिन समय के साथ कजरी गांव की चौपाल से निकलकर शास्त्रीय संगीत के मंच तक पहुंची। बनारस घराने के कई दिग्गज कलाकारों ने इसे नई पहचान दी। उन्होंने लोकधुन को शास्त्रीय रागों के साथ प्रस्तुत किया। इससे संगीत की गंभीर विधा भी बन गई।
संगीतशास्त्री पीटर मैनुएल ने अपनी किताब म्युजिक इन बनारस में भी लिखा है कि बनारस ने लोक और शास्त्रीय संगीत के बीच एक अद्भुत पुल बनाया। कजरी इसकी सबसे सुंदर मिसालों में से एक है।

पद्मविभूषण गिरिजा देवी की फाइल फोटो
ठमरी क्वीन ने कजरी को किया अमर
तीनों पद्म सम्मान से सम्मानित स्वर्गीय गिरिजा देवी ने कजरी को देश-विदेश तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। यूं तो उन्हें 'ठुमरी क्वीन' कहा जाता था, लेकिन उनके कंठ से फूटी कजरी गीतों ने लोगों के दिल जीत लिये। गिरिजा देवी हमेशा कहा करती थीं कि कजरी गाने के लिए सुर ही नहीं, मिट्टी की खुशबू भी चाहिए। कजरी बनारस और पूर्वांचल की आत्मा है। इसे सीखने के साथ ही महसूस भी करना पड़ता है।
आज तो गीत लिखे जाते हैं। पहले ये महसूस ही किये जाते थे। इंसान जो महसूस करता..वही गीत बन जाता। कजरी भी सावन में महसूस किये जाने वाले उन्हीं एहसासों से निकला गीत है।
