What is Parasocial Jealousy: सोशल मीडिया स्क्रोल करते हुए कई बार ऐसा होता है कि लोग एक अनजाना सा खालीपन और जलन महसूस करने लगते हैं। ये लगो दूसरों की लाइफस्टाइल, कपड़ों और खुशियों को देखकर खुद को कमतर आंकने लगते हैं। वो ऐसे लोगों से अपनी तुलना करने लगते हैं जिनसे वो शायद कभी मिले भी नहीं होते। इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में 'पैरासोशल जेलसी' (Parasocial Jealousy) कहा जाता है। आइए इस तरह के जलन की भावना को विस्तार से समझते हैं:
क्या है पैरासोशल ईर्ष्या?
आमतौर पर 'पैरासोशल रिलेशनशिप' का मतलब होता है किसी सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर के साथ हमारा एकतरफा लगाव। लेकिन इसका एक दूसरा अंधेरा पहलू भी है- पैरासोशल ईर्ष्या। यह तब होती है जब कोई अनजान व्यक्ति अनजाने में ही आपका 'कॉम्पिटिशन' बन जाता है। आप उन्हें देखते हैं, उनके जीवन की तुलना अपने जीवन से करते हैं और अंत में खुद को अधूरा पाते हैं।
कैसे जन्म लेती है ये जलन
पुराने समय में ईर्ष्या के लिए करीब होना जरूरी था, जैसे कोई सहपाठी या सहकर्मी। लेकिन सोशल मीडिया ने इस दूरी को खत्म कर दिया है। अब आपके पास अनजानों के जीवन तक पहुंच है। आप उनके जीवन के चुनिंदा और बेहतरीन लम्हों को देखते हैं और अपने दिमाग में उनकी एक ऐसी छवि बना लेते हैं जो परफेक्ट और कम्पलीट लगती है। जब कोई दूसरा कम्पलीट लगने लगता है, तो वह हमें अपने लिए खतरा महसूस होने लगता है।
यह ईर्ष्या अकसर स्क्रॉलिंग से शुरू होती है। आप किसी को फॉलो करते हैं और चुपचाप खुद का मूल्यांकन करने लगते हैं। खुद से पूछने लगते हैं कि मैं उसके मुकाबले कहां हूं? आप किसी ऐसे व्यक्ति के कारण हीन महसूस कर रहे हैं जिसे पता भी नहीं कि आप अस्तित्व में हैं। इसके परिणामस्वरूप, आप खुद को उनके 'बेंचमार्क' के हिसाब से बदलने लगते हैं। चाहे वह आपका शरीर हो, कपड़े हों या आपके लक्ष्य।
यह भावना इतनी तीव्र क्यों है?
आज हम किसी के जीवन को कभी-कभी नहीं, बल्कि दिन में कई बार टुकड़ों में देखते हैं। हमारा दिमाग उन खाली जगहों को अपनी कल्पना से भर देता है और सामने वाले को वास्तविक इंसान से कहीं ज्यादा व्यवस्थित और खुश मान लेता है। हम उनकी अनिश्चितता, बोरियत या संघर्ष को नहीं देख पाते, सिर्फ उनकी 'जीत' देखते हैं।
क्या होता है असर
पैरासोशल ईर्ष्या को अक्सर 'मोटिवेशन' का नाम दे दिया जाता है। जैसे - उसे देखो और बेहतर करो। लेकिन तुलना पर टिकी प्रेरणा की एक सीमा होती है। यह आपकी बाहरी सतह को तो सुधार सकती है, लेकिन भीतर की असुरक्षा को और गहरा कर देती है। आप जितना खुद को एडजस्ट करेंगे, तुलना के लिए कोई न कोई नया व्यक्ति हमेशा सामने खड़ा होगा।
कुल मिलाकर ये माना जाए कि सोशल मीडिया एक आईने की तरह काम करता है, जहां हम खुद को वैसे देखते हैं जैसे हम दिखना चाहते हैं, न कि जैसे हम वास्तव में हैं। इस अनजान जलन से बचने का एकमात्र तरीका यह समझना है कि जो हम स्क्रीन पर जो देख रहे हैं, वह पूरा सच नहीं है।
