बचपन की हिंदी वाली किताब में या कहीं किसी वाक्य में आपने भी कभी न कभी जरूर ही सुना होगा कि, 'बस दो जून की रोटी का इंतजाम हो जाए, वही बहुत है।' ये वाक्य बोलचाल की भाषा में अक्सर ही इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसके असली अर्थ और इतिहास के बारे में शायद ही ज्यादा लोग जानते हैं। कई लोगों को लगता है कि, दो जून की रोटी कोई खास तरह की रोटी है या इसका संबंध जून महीने के किसी खास दिन से है।
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हालांकि ऐसा नहीं है, यह हिंदी/अवधी भाषा का एक पुराना और बेहद प्रसिद्ध मुहावरा है। जो आम आदमी की जिंदगी और उसकी जरूरतों से जुड़ा हुआ है। यह मुहावरा सिर्फ खाने की बात नहीं करता, बल्कि रोटी के लिए किए गए संघर्ष को भी दिखाता है। जो लोग अपने परिवार का पेट भरने के लिए रोज करते हैं। जानिए आखिर दो जून की रोटी का असली मतलब क्या है और यह मुहावरा कहां से आया।
क्या होता है 'दो जून की रोटी' का मतलब?
अगर आसान शब्दों में कहें तो दो जून की रोटी का अर्थ है दिन में दो बार भरपेट भोजन मिलना। दो जून की रोटी यानि की दो वक्त की रोटी या सुबह शाम का खाना। इसका इस्तेमाल अक्सर ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो अपनी मेहनत से परिवार को दो वक्त की रोटी खिलाने के काबिल होता है।

2 June ki roti ka matlab kya hai
'जून' शब्द का क्या अर्थ है?
कई लोगों को लगता है कि यहां 'जून' शब्द का संबंध जून महीने से है, लेकिन ऐसा नहीं है। इस मुहावरे में 'जून' का मतलब समय या वक्त से है। पुराने समय की बोलचाल और कुछ भाषाओं में जून शब्द का उपयोग समय के लिए भी किया जाता है।। इसलिए दो जून का मतलब हुआ दिन के दो वक्त।
सिर्फ खाना नहीं, गुजारे का प्रतीक
आज दो जून की रोटी का मतलब केवल दो वक्त के खाने जितना नहीं रह गया है। अब इसका इस्तेमाल उस आमदनी के लिए भी किया जाता है जिससे किसी व्यक्ति का रोज का खर्च और परिवार चलता है।
आज भी क्यों होता है इस्तेमाल?
बदलते समय के साथ भी, ये मुहावरा आज लोगों की जुबान पर है क्योंकि यह जीवन की दो सबसे जरूरी चीजों के बारे में बात करता है। जो है भोजन और आजीविका, यही कारण है कि ये मुहावरा पीढ़ियों से इस्तेमाल हो रहा है।
