लाइफस्टाइल

आइसक्रीम की दुनिया का वो 'मीठा हादसा', जिसने हमेशा के लिए बदल दिया Icecream खाने का तरीका

Ice Cream Cone History: आज के नजरिए से देखें तो कोन एक ऐसी पैकेजिंग थी, जिसे इस्तेमाल करने के बाद अलग से फेंकना नहीं पड़ता था। पैकेजिंग को ही खा जाओ- कोई कचरा नहीं बचेगा।

Image

जानिए आइसक्रीम की दुनिया को कैसे मिला कोन (AI Image)

Ice Cream Cone History: हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां हर चीज पहले से तय है। स्मार्टफोन के कर्व्स से लेकर कारों के एयरोडायनामिक्स तक, सब कुछ बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं में महीनों की रिसर्च के बाद तय होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के हर देश में मिल जाने वाली आइसक्रीम कोन किसी जीनियस डिजाइनर के दिमाग की उपज नहीं, भीड़ और अफरा तफरी का नतीजा थी?

बात है साल 1904 के अमेरिका की। वहां सेंट लुइस वर्ल्ड्स फेयर चल रहा था। इस मेले में, एक साधारण सा आइसक्रीम बेचने वाला अपनी ही सफलता के बोझ तले दबा जा रहा था। दरअसल भीड़ इतनी थी कि उसके सारे कटोरे और चम्मच खत्म हो चुके थे। उसके सामने संकट ये था कि आइसक्रीम मौजूद है, ग्राहक भी है, लेकिन उसे परोसा कैसे जाए? ये वो समय था, जब आइसक्रीम सिर्फ कटोरी, प्लेट या कांच के बर्तन में परोसी जाती थी।

यहीं से इतिहास ने करवट ली। इस आइसक्रीम वाले के बराबर में सीरिया से आए अर्नेस्ट ए. हमवी ने अपना स्टॉल लगाया था। वह अपने स्टॉल पर 'जलाबिया' नाम की कुरकुरी पेस्ट्री बेच रहे थे। उन्होंने देखा कि पड़ोसी संकट में है। हमवी ने तुरंत एक गर्म वफल उठाई, उसे कोन का आकार दिया और बढ़ा दिया आइसक्रीम बेचने वाले अपने पड़ोसी को। कोन देते हुए बोले- इसमें आइसक्रीम रखकर देखिए। ग्राहकों को यह नया तरीका इतना पसंद आया कि कुछ ही घंटों में कोन खुद एक आकर्षण बन गया।

यहां ये जानना भी जरूरी है कि 1904 का मेला सिर्फ एक मेला नहीं था। यह वह दौर था जब अमेरिका तेजी से उपभोक्तावादी समाज बन रहा था। लोग चलते-फिरते खाना चाहते थे। इतिहासकार वॉरेन बेलास्को अपनी किताब Appetite for Change में लिखते हैं कि इसी दौर में "फूड ऑन द मूव" अमेरिकी जीवनशैली का हिस्सा बनने लगा। आइसक्रीम कोन उसी बदलाव का प्रतीक है।

टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: जानें बारिश में भुट्टा खाने का सही तरीका

पेटेंट की जंग

जैसा कि हर महान आविष्कार के साथ होता है, कहानी इतनी सपाट नहीं है। फूड हिस्टोरियन ऐन कूपर फंडरबर्ग की रिसर्च इस नैरेटिव में एक दिलचस्प ट्विस्ट लाती है। अर्नेस्ट हमवी से पहले, 1903 में ही एक इतालवी अप्रवासी इटालो इसका पेटेंट करवा रखा था। वो कोन में नींबू वाली बर्फ बेचा करते थे। इतिहास आज भी यह तय नहीं कर पाया है कि पहला आइसक्रीम कोन किसने बनाया। लेकिन इतिहासकार एक बात पर सहमत हैं का 1904 का सेंट लुइस फेयर वह मोड़ था, जहां से कोन दुनिया भर में लोकप्रिय हो गया।

कोन ने आइसक्रीम की दुनिया में क्रांति ला दी। कोन ने लोगों को सहूलियत दी कि वो चलते फिरते भी आइसक्रीन खा सकते हैं। आज के नजरिए से देखें तो कोन एक ऐसी पैकेजिंग थी, जिसे इस्तेमाल करने के बाद अलग से फेंकना नहीं पड़ता था। पैकेजिंग को ही खा जाओ- कोई कचरा नहीं बचेगा।

इसने इंसान को बर्तनों के बंधन और टेबल की सीमाओं से आजाद कर दिया। अब आप पार्क में टहलते हुए, समुद्र के किनारे या किसी से बात करते हुए भी दुनिया के सबसे बेहतरीन स्वाद का आनंद ले सकते थे।

टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: नरगिसी कोफ्ते को कैसे मिला ये नाम

लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

आइसक्रीम कोन ने जो क्रांति छेड़ी थी, उससे बहुत से लोग जुड़ने लगे। 1912 में फ्रेडरिक ब्रुकमैन ने कोन रोल करने वाली स्वचालित मशीन बना डाली। मशीन से निकले कोन ने आइसक्रीम को 'लक्ज़री' से निकालकर 'मास प्रोडक्ट' बना दिया।

आइसक्रीम कोन का यह सफर सबक देता है कि हमेशा आवश्यकता ही आविष्कार को जन्म देती है। अगर 1904 के उस तपते दिन कांच के कटोरे खत्म न हुए होते, तो शायद हमारी गर्मियों की यादें इतनी कुरकुरी और इतनी स्वादिष्ट न होतीं।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

और पढ़ें
End of Article