Savitribai Phule Birth Anniversary: पुणे की संकरी गलियों में साल 1848 की एक सुबह। एक महिला घर से निकली। हाथ में किताबें और आंखों में अटल आत्मविश्वास था। थोड़ा आगे बढ़ते ही कुछ लोग फुसफुसाने लगे। अचानक किसी का फेंका पत्थर कंधे पर लगा, चेहरे पर कीचड़ उछाला गया, अपशब्दों की बौछार हुई। लेकिन वह णहिला रुकी नहीं। उन्हें पता था कि स्कूल पहुंचकर मैली साड़ी बदलनी होगी। यह महिला थीं सावित्रीबाई फुले। भारत की पहली महिला शिक्षिका और नारी शिक्षा की क्रांतिकारी सावित्रीबाई फुले।
3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गांव में जन्मी सावित्रीबाई का बचपन उस दौर में बीता जब लड़कियों का अक्षर ज्ञान पाप माना जाता था। मात्र 9 साल की उम्र में 13 साल के समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से उनकी शादी हुई। ज्योतिराव ने उनकी प्रतिभा पहचानी और घर पर पढ़ाना शुरू किया। सावित्रीबाई जल्दी ही पढ़ी-लिखी हो गईं। ज्योतिराव का मानना था कि समाज बदलना है तो महिलाओं को शिक्षित करना होगा।
सगुणाबाई और सावित्रीबाई ने मिलकर पहला कदम उठाया। गांव की अमराई में दलित महिलाओं के लिए पहली अनौपचारिक पाठशाला शुरू हुई। फिर 1 जनवरी 1848 को पुणे के भिडे वाडा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला गया – शुरुआत में सिर्फ 6 छात्राओं के साथ। समाज ने इसका कड़ा विरोध किया। सावित्रीबाई को रास्ते में पत्थर मारे जाते, कीचड़ उछाला जाता, लेकिन वे नहीं रुकीं।
स्कूल में गणित-विज्ञान के साथ तर्कशक्ति सिखाई जाती थी। सावित्रीबाई मानती थीं कि शिक्षा बौद्धिक मुक्ति है। उन्होंने विधवाओं के शोषण के खिलाफ 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' खोला, जहां गर्भवती विधवाएं सम्मान से बच्चे जन्म दे सकें।
सावित्रीबाई एक क्रांतिकारी कवयित्री भी थीं। उनकी रचना 'काव्य फुले' में वे लिखती हैं, "जाओ, शिक्षा प्राप्त करो, स्वावलंबी बनो।" उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा को 'अंग्रेजी माता' कहा। उनका तर्क था कि अंग्रेजी एक ऐसी खिड़की थी जिससे दुनियाभर के आधुनिक विचार भारत में आ सकते थे। वे चाहती थीं कि बहुजन समाज वैश्विक ज्ञान से जुड़े।
1897 में पुणे में प्लेग महामारी फैली। सावित्रीबाई ने दलित बस्तियों में सेवा की। एक बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर अस्पताल पहुंचाया, लेकिन खुद संक्रमित हो गईं। 10 मार्च 1897 को 66 साल की उम्र में उनका निधन हुआ।
आज उनकी विरासत जीवित है। 2 जुलाई 2025 को राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD) का नाम बदलकर 'सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान' कर दिया गया। 4 जुलाई को रांची में इसका नया केंद्र उद्घाटन हुआ।
सावित्रीबाई फुले ने साबित किया कि शिक्षा से सदियों की गुलामी टूट सकती है। उनकी लड़ाई आज भी प्रेरणा देती है – नारी शिक्षा और सामाजिक न्याय की।
