Royal Rasoi (रॉयल रसोई): शाहजहां मुगल साम्राज्य का पांचवा बादशाह था। शाहजहां के शासन काल को मुगलिया सल्तनत का सबसे सुनहरा दौर माना गया है। ताजमहल जैसी इमारत का निर्माण करवाने वाले शाहजहां की शख्सियत का एक बेहद दिलचस्प पहलू उसके अनोखे खानपान और भोजन के लिए खास लगाव भी था। टाइम्स नाउ नवभारत की खास सीरीज रॉयल रसोई के आज के अंक में शाहजहां के बिरयानी प्रेम पर नजर डालेंगे।
शाहजहां के शाही दस्तरखान पर रोज ऐसे-ऐसे व्यंजन सजते थे, जिनकी खुशबू और स्वाद दूर-दूर तक चर्चा का विषय बन जाते थे। इतिहासकारों के अनुसार शाहजहां के महल की रसोई में सैकड़ों रसोइए काम करते थे, जो फारसी, तुर्की, कश्मीरी और भारतीय पाक शैलियों का अनूठा संगम पेश करते थे।
कैसा था शाहजहां का खानपान
लंदन की एक लाइब्रेरी में मौजूद ऐतिहासिक प्रतिलिपि नुस्खा-ए-शाहजहानी के मुताबिक शाहजहां को खास तौर पर सुगंधित पुलाव, केसर वाली बिरयानी, नर्म कबाब, मुर्ग मुसल्लम और सूखे मेवों से बने पकवान बेहद पसंद थे। उसकी थाली में गुलाब जल, केवड़ा और केसर का भरपूर इस्तेमाल किया जाता था ताकि हर व्यंजन शाही खुशबू से महक उठे। मिठाइयों में शीर-खुरमा, फिरनी और बादाम-पिस्ते से सजी खीर उसकी पसंदीदा डिश मानी जाती थीं।
इतिहास में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि भोजन परोसने से पहले उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की विशेष जांच की जाती थी। फलों और शरबतों का भी खास इंतजाम रहता था, जिनमें अनार, खरबूजा, अंगूर और आम प्रमुख थे। गर्मियों में बर्फ मिलाकर ठंडे शरबत परोसे जाते थे, जो उस समय शाही वैभव की निशानी थे।
शाहजहां का दस्तरखान मुगल साम्राज्य की समृद्धि, कला और पाक परंपरा का प्रदर्शन भी था। यही वजह है कि आज भी मुगलई व्यंजनों की चर्चा होती है तो शाहजहां के शाही स्वाद का जिक्र जरूर किया जाता है।
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बिरियानी के लिए शाहजहां की दीवानगी
मशहूर फूड हिस्टोरियेन सलमा हुसैन ने अपनी किताब द मुगल फीस्ट में लिखा है कि शाहजहां को बिरियानी इतनी पसंद थी कि उसके लिए करीब 100 तरह की बिरियानी बनती थी। शाही रसोइये रोज किसी नए तरह की बिरियानी बनाते। सलमा लिखती हैं कि शाहजहां की बिरियानी में रंग बिरंगे चावल होते थे। चावल को फलों के रंग से रंगा जाता था और तब पकाया जाता था।
शाहजहां किस दिन क्या खाएंगे इस बात का फैसला शाही हकीम करते थे। हकीम ही शाही रसोई को फरमान जारी करते कि आज बादशाह कौन सी बिरयानी खाएंगे। इन्हीं हकीमों के कहने पर शाहजहां के लिए बनने वाली बिरयानी के चावल के हर दाने पर चांदी के तेल का लेप लगया जाता था। हकीमों का मानना था कि चांदी के तेल या वर्क से बादशाह का पाचन भी सही रहेगा और उनकी कामोत्तेजना भी बढ़ेगी।
शाहजहां को सोने और चांदी की थाली में ही खाना परोसा जाता था। अपने पुरखों की तरह शाहजहां भी अपने हरम में रानियों के साथ ही भोजन करता। कुछ खास मौके पर वह दरबार के सरदारों के साथ भोजन करा लेकिन आमतौर पर हरम में ही उसका दस्तरखान सजता।
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शाहजहां को जो भोजन परोसा जाता था वह भोजन शाही दस्तरखान में पहुंचने से पहले एक खास तरह के बर्तन से हो कर गुजरता था। क्या था इस तस्तरी का राज, ये बताएंगे आपको रॉयल रसोई के अगले अंक में।
