Royal Rasoi: भारत से सैकड़ों साल पहले मुगल काल खत्म हो चुका है। फिर भी मुगलों का शाही खानपान आज भारतीय इतिहास की सबसे समृद्ध पाक परंपराओं में खास जगह रखता है। कई मुगल बादशाह खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। उनका शौक ही था कि महल की शाही रसोई में दूर-दूर से आए रसोइए लजीज व्यंजन तैयार करते थे। मुगलों की पाक कला में खास तौर पर मध्य एशिया और फारस का असर साफ दिखता था। शाही मुगल दस्तरखान पर हमारी खास सीरीज रॉयल रसोई के आज के अंक में हम आपको बताएंगे कि मुगल बादशाहों की थाली तक पहुंचने से पहले भोजन किन-किन पड़ावों से गुजरता।
बाबर के बाद के लगभग सारे मुगल बादशाहों ने अपने महल में शाही रसोई बनवाई। इसमें पहला नाम अकबर की शाही रसोई का आता है। अकबर के शासन काल में मुगलिया पाक कला अपने चरम पर रही। ये कहना भी गलत ना होगा कि अकबर ने पाक कला में क्रांति ला दी थी। कई तरह के खास व्यंजन ईजाद हुए। ये व्यंजन शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के थे। अकबर खुद भी स्वाद का बड़ा पारखी था। अपने भोजन में केसर और गुलाब जल की खुशबू उसे बेहद पसंद थी।
कैसी थी अकबर की शाही रसोई
अकबर की रसोई जितनी शाही थी उतनी शायद किसी दूसरे मुगल बादशाह की नहीं रही। फारसी के विद्वान और इतिहासकार एनीमेरी शिमेल ने अपनी किताब द एम्पायर ऑफ द ग्रेट मुगल्स: हिस्ट्री, आर्ट एंड कल्चर में अकबर की रसोई पर विस्तार से लिखा है। किताब के मुताबिक अकबर की शाही रसोई में 400 से अधिक रसोइए काम करते थे। इसमें भारतीय रसोइयों के साथ ही बड़ी संख्या में फारस के भी रसोइए शामिल थे। शाही रसोई के हर रसोइए की अपनी अलग जिम्मेदारी होती थी और रोजाना उससे किसी एक खास व्यंजन को तैयार करने की अपेक्षा की जाती थी।
शाही रसोई में रोज बनते सैकड़ों पकवान (AI Image)
बादशाह का खास खानसामा
रसोई प्रशासन के लिए ऊंचे पद पर अधिकारी रखे जाते थे। इनमें हेड कुक, कोषाध्यक्ष, स्टोर कीपर, कलर्क और सुपरिटेंडेंट जैसे पद शामिल थे। सारे कर्मचारियों पर नजर रखता था रसोई घर का सुपरिटेंडेंट जिसे तब खानसामा कहा जाता था। खानसामा के लिए रसोई प्रांगण के बीचोंबीच एक मंच बना होता था। यहीं से वह शाही खानसामा पूरी रसोई और रसोइयो पर नजर रखता था।
अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में लिखा है कि अकबर का खास खानसामा मीर बकावल हुआ करता था। अकबर के खानसामे को कुछ ऐसी सुविधाएं भी मिलती थीं जो दरबार के किसी भी हकीम हमाम, यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी नसीब नहीं थीं।
शाही रसोई में दो खास कमरे बने होते। इन्हें दौलत खाना और अब्दरखाना नाम से जाना जाता था। बादशाह अकबर की थाली में परोसा गया खाना पहले इन दोनों कमरों में चखा जाता था। परीक्षण के बाद ही शाही थाली अकबर के सामने पेश की जाती थी। अकबर की थाली लगाने और उनके सामने पेश करने का जिम्मा कुछ खास किन्नरों को मिला हुआ था।
खास किन्नर ही अकबर को परोसते थे खाना (AI Image)
बादशाह अकबर आज भोजन में क्या-क्या खाएंगे यह तय करने के लिए खास तौर पर अनुभवी वैद्यों की तैनाती भी थी। ये वैद्य ऐसा मेन्यू तैयार करते जिससे बादशाह के स्वाद के साथ ही उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा सके। इन्हीं वैद्यों के सुझाव के बाद अकबर के शाही रसोई में भारतीय मसालों और जड़ीबूटियों की आमद मानी जाती है।
गुलाब जल से सींची जाती थी सब्जियां
अकबर गुलाबजल की खुशबू और केसर के जायके का बहुत बड़ा मुरीद थी। गुलाब जल के लिए अकबर की दीवानगी आप इसी से समझ सकते हैं कि उसके किचन गार्डन में लगी सब्जियों को पानी से नहीं गुलाबजल से सींचा जाता था। इस बात की तस्दीक ख्याति प्राप्त फूड हिस्टोरियन कोलिन टेलर सेन ने अपनी चर्चित किताब अ हिस्ट्री ऑफ फूड इन इंडिया में की है।
कोलिन टेलर सेन लिखते हैं कि अकबर को अपने भोजन में केसर की खुशबू इस हद तक पसंद थी कि उसके लिए पकाई जाने वाली मुर्गियों को भी केसर खिलाया जाता था, ताकि जब वह कट-पक कर बादशाह की थाली में पहुंचे तो केसर का खास जायका मिले। मुर्गियों को केसर के दाने खिलाने के साथ ही और भी कई तरह से खातिरदारी की जाती थी। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं: कस्तूरी तेल से मसाज और खाने को केसर, अकबर की थाली में जाने से पहले यूं होती थी मुर्गों की खातिरदारी
जहां जाता अकबर साथ चलती शाही रसोई
अकबर पर कई इतिहासकारों ने लिखा है कि जब भी वह यात्रा करता तो शाही रसोई उसके साथ चलती। सलमा हुसैन की किताब द एम्परर्स टेबल – द आर्ट ऑफ मुगल कुजीन के मुताबिक अकबर के साथ चलने वाली शाही रसोई को 50 ऊंट दिये जाते ताकि वह रसोइयों को ढो सके। ताजा दूध मिले इसके लिए 50 चुनी हुई स्वस्थ गायें साथ रखी जाती थीं। 200 से अधिक कुली चीनी मिट्टी के बर्तन, थालियां और भोजन परोसने के दूसरे सामान लेकर चलते थे। खाना पकाने के बड़े-बड़े बर्तनों और उपकरणों को ढोने के लिए खच्चरों का इस्तेमाल किया जाता था।
अकबर के साथ चलती शाही रसोई (AI Image)
चलती फिरती इस शाही रसोई की सुरक्षा और संचालन के लिए सेना की एक टुकड़ी भी साथ चलती थी। इसके अलावा पानी पहुंचाने वाले, सफाईकर्मी, चमड़े के कारीगर और रात में रोशनी की व्यवस्था करने वाले मशालची भी इस काफिले का हिस्सा होते थे।
अबुल फजल के मुताबिक इस चलती फिरती शाही रसोई का नेतृत्व करता था मीर बकावल। वही मीर बकावल जिसे अकबर ने अपना खानसामा बनाया था। दूसरे दरबारियों के बीच उसके पास रसोई प्रमुख का पद मिला जो कि 600 घोड़ों का होता था। इतने घोड़ों के दस्ते के साथ अकबर के प्रधानमंत्री भी नहीं चल सकते थे, लेकिन स्वाद के कद्रदान और पाक कला के प्रेमी अकबर के लिए उसकी शाही रसोई का एक अलग ही स्थान था।
