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Psychology: क्यों मुश्किल हालातों में कुछ लोगों की बनी रहती है मुस्कान, जानें क्या कहता है मनोविज्ञान

मनोविज्ञान कहता है कि इंसान की मुस्कान कई तरह की होती है। कुछ लोग तनाव कम करने के लिए मुस्कुराते हैं, कुछ दूसरों को परेशान नहीं करना चाहते और कुछ हालात को स्वीकार करने का संकेत देते हैं।

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बुरे दौर में भी कुछ लोगों की क्यों नहीं जाती मुस्कान (Photo: iStock)

Psychological Facts: कभी आपने ऐसे लोगों को देखा है जो नौकरी छूटने, रिश्ते टूटने या किसी बड़े नुकसान के बाद भी चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हैं? पहली नजर में लगता है कि शायद उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि हर मुस्कुराहट का मतलब खुशी नहीं होता। कई बार यह मानसिक मजबूती की निशानी होती है, तो कभी दर्द छिपाने का तरीका भी। आइए विस्तार से जानते हैं मुश्किल हालातों में भी चेहरे पर मुस्कान बनाए रहने वाले लोगों के लिए क्या कहता है मनोविज्ञान:

क्या कहता है मनोविज्ञान

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि इंसान की मुस्कान कई तरह की हो सकती है। कुछ लोग तनाव कम करने के लिए मुस्कुराते हैं, कुछ दूसरों को परेशान नहीं करना चाहते और कुछ हालात को स्वीकार करने का संकेत देते हैं। यानी मुश्किल समय में मुस्कुराना हमेशा यह नहीं बताता कि व्यक्ति दुखी नहीं है।

इमोशनली स्ट्रॉन्ग होते हैं ऐसे लोग

मनोविज्ञान में रेज़िलिएंस यानी विपरीत परिस्थितियों से उबरने की क्षमता को मानसिक मजबूती का अहम गुण माना जाता है। ऐसे लोग समस्या से भागने के बजाय उसका सामना करने की कोशिश करते हैं। उनकी मुस्कान यह संदेश देती है कि परिस्थितियां कठिन हैं, लेकिन वे उनसे हार नहीं मानेंगे।

खुद को संभालने का तरीका

एक्सपर्ट्स का मानना है कि मुस्कुराने से शरीर में ऐसे हार्मोन सक्रिय होते हैं जो तनाव को कुछ हद तक कम करने में मदद करते हैं। यही कारण है कि कई लोग कठिन परिस्थितियों में भी खुद को शांत रखने के लिए मुस्कुराने की कोशिश करते हैं। यह एक तरह का कोपिंग मैकेनिज्म भी हो सकता है।

दर्द छिपाने के लिए भी मुस्कुराते हैं कुछ लोग

कई बार लोग अपने भीतर के दर्द, अकेलेपन या चिंता को छिपाने के लिए भी सामान्य दिखने की कोशिश करते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे मास्किंग कहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को सिर्फ उसकी मुस्कान देखकर खुश मान लेना सही नहीं है।

जो लोग हर परिस्थिति में उम्मीद की एक किरण खोज लेते हैं, वे मुश्किल समय में भी अपेक्षाकृत शांत रहते हैं। वे समस्या पर नहीं, समाधान पर ज्यादा ध्यान देते हैं। यही सोच उन्हें भावनात्मक रूप से संतुलित रहने में मदद करती है और उनके चेहरे पर मुस्कान बनाए रखती है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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