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Psychology: क्यों अपने पेट्स से बात कर सुकून पाता है इंसान, जानिए क्या कहता है मनोविज्ञान

मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को एंथ्रोपोमॉर्फिज्म कहा जाता है। इसका मतलब है किसी जानवर या वस्तु में इंसानों जैसी भावनाएं और व्यक्तित्व देखना।

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कुछ लोग क्यों अपने पालतू जानवरों से बात करते हैं लोग (Photo: iStock)

क्या आपने कभी किसी को अपने कुत्ते या बिल्ली से ऐसे बात करते देखा है, जैसे वह घर का कोई सदस्य हो? कई लोग करते हैं। उनके लिए उनके पेट्स उनके बेटा, बेटी या दोस्त से कम नहीं होते। कुछ तो उनसे अपने दिनभर की बातें शेयर करते हैं। उनकी नाराजगी और खुशी भी समझने की कोशिश करते हैं। देखने पर यह भले अजीब लगे लेकिन मनोविज्ञान इसे बिल्कुल सामान्य मानता है।

क्या कहता है मनोविज्ञान

मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को एंथ्रोपोमॉर्फिज्म कहा जाता है। इसका मतलब है किसी जानवर या वस्तु में इंसानों जैसी भावनाएं और व्यक्तित्व देखना। अमेरिका के मनोवैज्ञानिक निकोलस एप्ली ने अपने शोध में लिखा है कि इंसान दुनिया को समझने के लिए यही तरीका अपनाता है। इसलिए उसे लगता है कि उसका कुत्ता नाराज है, बिल्ली खुश है या तोता उससे प्यार जताने की कोशिश कर रहा है।

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वैसे यह केवल इंसान की कल्पना नहीं होती। वैज्ञानिकों का कहना है कि पालतू जानवर भी अपने मालिक की भावनाओं को काफी हद तक समझ लेते हैं। खासकर कुत्ते। कुत्ते इंसान की आवाज का उतार-चढ़ाव पहचान लेते हैं। वे यह भी समझ लेते हैं कि सामने वाला खुश है, दुखी है या गुस्से में है।

यही वजह है कि कई लोग तनाव में होने पर अपने पेट के पास बैठना पसंद करते हैं। उनसे बातें करते हैं। ऐसा करने से मन हल्का महसूस होता है। मनोवैज्ञानिक इसे गलत नहीं मानते। उनका कहना है कि कभी-कभी बिना किसी डर के अपनी बात कह पाना भी मानसिक राहत देता है।

पेट्स में भी होते हैं इंसानी हार्मोन्स

एक और दिलचस्प बात जापान के Azabu University के शोध में सामने आई। साइंस जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, जब कुत्ता और उसका मालिक कुछ देर तक एक-दूसरे की आंखों में देखते हैं, तो दोनों के शरीर में ऑक्सीटोसिन नाम का हार्मोन बढ़ जाता है। इसे बॉन्डिंग हार्मोन भी कहा जाता है। यही हार्मोन मां और बच्चे के रिश्ते को मजबूत बनाने में भी अहम भूमिका निभाता है।

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ध्यान रहे ये बात

हालांकि विशेषज्ञ एक संतुलन की बात भी करते हैं। पालतू जानवर से प्यार करना अच्छी बात है। उससे बातें करना भी स्वाभाविक है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति पूरी तरह इंसानी रिश्तों से दूर होकर केवल अपने पेट तक सीमित हो जाए, तो यह चिंता की बात हो सकती है। इसलिए पेट्स जीवन का खूबसूरत हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे समाज और परिवार की जगह नहीं ले सकते।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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