Mohanthal History in Hindi: गुजरात और राजस्थान की एक मशहूर मिठाई है जिसका स्वाद किसी दिव्य प्रसाद से कम नहीं लगता और नाम इसका साक्षत कृष्ण भगवान से जुड़ा है। बनावट के चलते कई बार मोहनथाल देखने में बेसन की बर्फी जैसी लगती है। लेकिन दोनों स्वाद और बनावट अलग ही होते हैं। वैसे इस लेख में बात हम इस मिठाई को बनाने के तरीके की नहीं बल्कि नाम की कहानी की करेंगे। थोड़ा ध्यान देंगे तो पाएंगे कि मोहनथाल के 'मोहन' में भगवान श्रीकृष्ण का नाम छिपा है और 'थाल' में उनके लिए सजाए जाने वाले भोग का भाव।
यानी नाम ही बताता है कि यह सिर्फ मिठाई नहीं, भगवान कृष्ण से जुड़ी एक पुरानी परंपरा भी है।
मोहनथाल का नाम कैसे पड़ा
मोहनथाल दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है- मोहन और थाल। 'मोहन' भगवान श्रीकृष्ण के कई नामों में से एक है। मोहन यानी वह, जो हर किसी का मन मोह ले। वहीं 'थाल' का मतलब उस थाली या भोग से है, जो भगवान के सामने सजाया जाता है। इस तरह मोहनथाल का सामान्य अर्थ हुआ- भगवान मोहन के लिए तैयार किया गया भोग।
यही कारण है कि मोहनथाल का रिश्ता सीधे श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है। कई वैष्णव परिवारों और मंदिरों में इसे ठाकुरजी के प्रसाद के रूप में तैयार किया जाता है। जन्माष्टमी पर कान्हा के लिए माखन-मिश्री, पंजीरी और पंचामृत के साथ मोहनथाल को भी भोग में एक तरह से अनिवार्य तरीके से रखा जाता है।
क्या मोहनथाल श्रीकृष्ण की प्रिय मिठाई थी
मोहनथाल को भगवान कृष्ण की प्रिय मिठाइयों में गिना जाता है। यह बात धार्मिक और लोक मान्यताओं में लंबे समय से चली आ रही है। हालांकि ऐसी कोई प्रमाणित ऐतिहासिक कथा नहीं मिलती, जिसमें बताया गया हो कि मोहनथाल पहली बार कब बना या स्वयं श्रीकृष्ण को यह मिठाई कितनी प्रिय थी।
साल 2020 में Indian Journal of Dairy Science में मोहनथाल पर प्रकाशित एक शोध में इसे गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों की पारंपरिक मिठाई बताया गया है। आईसीएआर-नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ताओं ने भी इसके नाम में 'मोहन' का संबंध भगवान कृष्ण और 'थाल' का संबंध थाली से बताया है। इस शोध में यह भी कहा गया है कि मोहनथाल की शुरुआत का इतिहास पूरी तरह साफ नहीं है। इससे जुड़ी लिखित जानकारी भी बहुत कम मिलती है।
शायद इसकी असली कहानी किताबों के बजाय उन घरों में बची हुई है, जहां आज भी मोहनथाल बनने पर पहला टुकड़ा खाने के लिए नहीं उठाया जाता। उसे पहले ठाकुरजी के सामने रखा जाता है। भोग लगने के बाद ही परिवार के लोग इसे प्रसाद के रूप में खाते हैं।

भक्ति, परंपरा और स्वाद का अद्भुत मेल है मोहनथाल
किताबों में भी दर्ज है मोहनथाल का स्वाद
प्रसिद्ध कुकरी लेखिका तरला दलाल ने अपनी किताब The Complete Gujarati Cookbook में मोहनथाल को गुजराती खानपान के उन पकवानों में शामिल किया है, जिन्हें बनाने में थोड़ी अधिक मेहनत और बारीकी चाहिए। अब सवाल उठता है कि बेसन, घी और चीनी से बनने वाली मिठाई में इतना मुश्किल क्या हो सकता है?
यही मोहनथाल की खासियत है। इसकी सामग्री तो साधारण है, लेकिन इसे बनाने का तरीका आसान नहीं। बेसन कितना मोटा होना चाहिए, उसे कितनी देर भूनना है, चाशनी किस तरह तैयार करनी है और मिश्रण को किस समय थाली में जमाना है- इनमें से हर बात इसके स्वाद और बनावट पर असर डालती है।
पद्मश्री शेफ संजीव कपूर भी इसे पारंपरिक गुजराती उत्सवी मिठाई के रूप में पेश कर चुके हैं। वहीं तरला दलाल की विधि में सही दानेदार बनावट पाने के लिए बेसन में गर्म दूध और घी मिलाने की खास प्रक्रिया बताई गई है।
गुजरात के हर शहर में अलग मिलता है मोहनथाल
मोहनथाल गुजरात की पहचान है, लेकिन पूरे प्रदेश में भी इसका स्वाद एक जैसा नहीं मिलता। Indian Journal of Dairy Science के अध्ययन में अहमदाबाद, आनंद, वडोदरा और पालनपुर जैसे अलग-अलग शहरों में मोहनथाल की मिठास, सामग्री और बनावट का फर्क मिला। इसके बाद भी अच्छे पारंपरिक मोहनथाल की कुछ खास पहचान सामने आईं- हल्का या मध्यम भूरा रंग, छोटे दाने, मुलायम लेकिन आकार संभालने वाली बनावट और भुने बेसन व घी की खुशबू।
कहीं इसमें मावे का स्वाद ज्यादा आता है तो कहीं इलायची और जायफल की खुशबू उभरती है। कोई हलवाई इसे अधिक दानेदार रखता है तो किसी के हाथ का मोहनथाल थोड़ा मुलायम होता है।
राजस्थान में इससे मिलती-जुलती मिठाई को कई जगह बेसन चक्की कहा जाता है। दोनों में बेसन, घी और चीनी का इस्तेमाल होता है, लेकिन इन्हें बनाने के तरीके और बनावट में थोड़ा अंतर रहता है।
दानेदार मोहनथाल बनाने का राज क्या है
अच्छे मोहनथाल की सबसे बड़ी पहचान उसकी दानेदार बनावट है। इसके लिए मोटे या लड्डू वाले बेसन में दूध और घी मिलाया जाता है। मिश्रण को कुछ देर रखने के बाद छाना जाता है। गुजरात की कई रसोइयों में इस प्रक्रिया को 'धाबो देना' कहा जाता है।
इसके बाद बेसन को धीमी आंच पर घी में भूना जाता है। इस दौरान जल्दबाजी नहीं की जा सकती। तेज आंच हुई तो बेसन जल सकता है और कम भूना तो उसमें कच्ची गंध रह जाएगी। सही तरह से भुनने पर बेसन का रंग बदलता है और उसमें से अच्छी खुशबू आने लगती है।
इसके बाद चाशनी मिलाई जाती है। चाशनी सही बनी तो मोहनथाल मुलायम और दानेदार रहेगा। वह थोड़ी भी आगे-पीछे हुई तो मिठाई सख्त, चिपचिपी या बिखरी हुई बन सकती है।
स्वाद, हुनर और भक्ति का मेल
अनुभवी हलवाई मोहनथाल बनाते समय केवल घड़ी नहीं देखते। वे बेसन का रंग देखकर समझ जाते हैं कि वह कितना भुन चुका है। खुशबू से पहचान लेते हैं कि अब चाशनी मिलाने का समय आ गया है। बेशक यह समझ किसी नाप-तौल वाली पर्ची से नहीं आती। इसके पीछे वर्षों का अनुभव होता है।
शायद इसीलिए हर घर और हर दुकान के मोहनथाल का स्वाद थोड़ा अलग होता है। लेकिन इस मिठाई का भाव वही रहता है और श्री कृष्ण के भक्त इसका पहला टुकड़ा जब 'मोहन' को अर्पित करते हैं तो इसे बनाने की मेहनत, परंपरा और भक्ति - सभी सार्थक हो जाते हैं।
