Mahila Diwas Par Kavita: हर साल International Women's Day 8 मार्च को दुनिया भर में मनाया जाता है। यह दिन महिला सशक्तिकरण और उनके सामाजिक योगदान को बढ़ावा देने के अवसर के रूप में देखा जाता है। चाहे वह शिक्षा हो, राजनीति हो, विज्ञान हो या कला का संसार समाज के हर क्षेत्र में महिलाएं आज अपनी पहचान बना रही हैं। महिला दिवस के इस खास मौके पर आइए पढ़ते हैं नारी की शक्ति, सपनों और संघर्ष को समर्पित 5 प्रेरणादायक कविताएं।
महिला दिवस पर कविताएं - Mahila Diwas Par Kavita
वह तोड़ती पत्थर
वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार :
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गईं,
प्राय: हुई दुपहर :
वह तोड़ती पत्थर।
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा
‘मैं तोड़ती पत्थर।’
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
नारी तुम केवल श्रद्धा हो
क्या कहती हो ठहरो नारी
संकल्प अश्रु-जल-से-अपने
तुम दान कर चुकी पहले ही
जीवन के सोने-से सपने
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास-रजत-नग पगतल में
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में
देवों की विजय, दानवों की
हारों का होता-युद्ध रहा
संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित
रह नित्य-विरूद्ध रहा
आँसू से भींगे अंचल पर
मन का सब कुछ रखना होगा
तुमको अपनी स्मित रेखा से
यह संधिपत्र लिखना होगा।
-जयशंकर प्रसाद
मेरे बेटे
मेरे बेटे
कभी इतने ऊँचे मत होना
कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो
उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ
न कभी इतने बुद्धिजीवी
कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग
इतने इज़्ज़तदार भी न होना
कि मुंह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो
न इतने तमीज़दार ही
कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी
इतने सभ्य भी मत होना
कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे
और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से
न इतने सुथरे ही होना
कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में
इतने धार्मिक मत होना
कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ
न कभी इतने देशभक्त
कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको
कभी इतने स्थायी मत होना
कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी
और न कभी इतने भरे-पूरे
कि किसी का प्रेम में बिलखना
और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प।
- कविता कादम्बरी
मैं नीर भरी
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक-से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत-भरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,
छाया में मलय-बयार पली!
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार, बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,
पद-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना;
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
-महादेवी वर्मा
