देशभर में जन्माष्टमी की धूम साफ नजर आ रही है। कृष्णभक्त इस इकस दिन का इंतजार सालभर करते हैं। मान्यता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। यूं तो श्रीकृष्ण का का पूरा जूवन अपने आप में अद्भुत है, लेकिन उन्होंने गीता में बहुत सी ऐसी बातें कही हैं जो किसी भी इंसान का काया पलट सकती है। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 6 का पांचवा श्लोक भी कुछ ऐसा ही है।
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
यह श्लोक सरल अर्थों में कहता है कि मनुष्य को चाहिए वह अपने मन और स्वयं के प्रयासों से खुद को ऊपर उठाए, खुद को गिराए नहीं। क्योंकि इंसान खुद ही अपना सबसे बड़ा मित्र है और खुद ही अपना सबसे बड़ा शत्रु भी।
भगवद्गीता का यह श्लोक जीवन की एक ऐसी सच्चाई सामने रखता है, जिसे समझने में पूरी जिंदगी लग जाती है। हम अपनी परेशानियों के लिए परिस्थितियों, लोगों और किस्मत को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण यहां ध्यान भीतर की ओर ले जाते हैं। वह कहते हैं कि इंसान अपने जीवन को बेहतर बनाने की शुरुआत खुद से कर सकता है।
खुद को उठाना भी हमारे हाथ में है
‘उद्धरेदात्मनाऽत्मानम्’ का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि इंसान मेहनत करके सफल हो जाए। इसका गहरा अर्थ है- अपने मन, विचारों और व्यवहार को इस तरह साधना कि वे हमें आगे लेकर जाएं।
हर इंसान के जीवन में ऐसे दौर आते हैं जब उसे असफलता, निराशा, अकेलापन या डर घेर लेता है। ऐसे समय में हमारा अपना मन हमें कमजोर कर सकता है। बार-बार यह सोचना कि ‘मैं नहीं कर सकता’, ‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है’ या ‘अब कुछ नहीं बदल सकता’ धीरे-धीरे आत्मविश्वास को खत्म कर देता है। इसके उलट, अगर इंसान अपने भीतर यह भरोसा बनाए रखता है कि वह मुश्किल परिस्थिति से सीखकर आगे बढ़ सकता है, तो वही मन उसकी ताकत बन जाता है।
इंसान खुद अपना दोस्त कैसे बनता है?
श्रीकृष्ण के अनुसार जब हमारा मन हमारे नियंत्रण में होता है, तो वह हमारा मित्र बन जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि मन में कभी नकारात्मक विचार नहीं आएंगे। बल्कि बात यह है कि हम उन विचारों को अपने ऊपर कितना हावी होने देते हैं।
गुस्सा आया, लेकिन हमने प्रतिक्रिया देने से पहले खुद को रोक लिया। असफलता मिली, लेकिन हमने उससे सीखने की कोशिश की। किसी ने आलोचना की, लेकिन हमने हर बात को अपने आत्मसम्मान पर हमला नहीं माना। यही आत्मसंयम धीरे-धीरे इंसान को भीतर से मजबूत बनाता है।
यही मन दुश्मन भी बन सकता है
जब मन इच्छाओं, डर, क्रोध, अहंकार और निराशा के नियंत्रण में आ जाता है, तो वही मन हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। कई बार बाहरी परिस्थितियां उतनी मुश्किल नहीं होतीं, जितनी हमारे भीतर चल रही उथल-पुथल उन्हें बना देती है। इसलिए यह श्लोक हमें दूसरों को बदलने से पहले खुद को समझने और संभालने की सीख देता है।
आज कितनी जरूरी है यह सीख?
आज की जिंदगी में तुलना, प्रतियोगिता और लगातार बेहतर दिखने का दबाव बहुत बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता देखकर अपने जीवन को छोटा समझना आसान है। ऐसे समय में गीता का यह संदेश याद दिलाता है कि हमारी असली लड़ाई किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, बल्कि अपने डर, आलस्य, नकारात्मक सोच और असंयम से है।
इस श्लोक का सार बेहद सरल है- परिस्थितियां हमेशा हमारे हाथ में नहीं होतीं, लेकिन उनके सामने हमारा रवैया काफी हद तक हमारे हाथ में होता है। खुद को गिराने वाले विचारों को पहचानना और धीरे-धीरे खुद को उनसे ऊपर उठाना ही इस श्लोक की असली सीख है। जब इंसान अपने मन को अपना साथी बना लेता है, तब बाहर की मुश्किलें भी उसे आसानी से तोड़ नहीं पातीं।
