Jaan Nisar Akhtar Shayari (जां निसार अख्तर की शायरी): जां निसार अख्तर का एक जिस्म में कई हुनर के मालिक थे। वह उर्दू के जबरदस्त शायर, गीतकार और कवि थे। जां निसार अख्तर ने शायरी के अलावा संपादन का काम भी खूब शानदार तरीके से किया। वह प्रोफेसर भी थे। बात शायर जां निसार अख्तर की करें तो उनकी सबसे बड़ी खूबी उनके शेरों की सादा जबान और खूबसूरत अहसास है। जां निसार अख्तर के बारे में मशहूर शायर निदा फ़ाजली का मानना था कि वह आख़िरी दम तक जवान रहे। बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा। आइए पढ़ते हैं उर्दू के ऐसे ही अजीम शायर जां निसार अख्तर के चंद चुनिंदा शेर:
1. चलो कि अपनी मोहब्बत सभी को बांट आएं
हर एक प्यार का भूखा दिखाई पड़ता है
2. उम्र-भर क़त्ल हुआ हूं मैं तुम्हारी ख़ातिर
आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ यारों
3. ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझ से मुकरने लगा हूं मैं
मुझ को संभाल हद से गुज़रने लगा हूं मैं
4. अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
5. इतनों का प्यार मुझ से संभाला न जाएगा
लोगो तुम्हारे प्यार से डरने लगा हूं मैं
6. लहजा बना के बात करें उन के सामने
हम से तो इस तरह का तमाशा किया न जाए
7. अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
8. वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे
सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हम ने
9. यूं तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत
प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने
10. हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है
ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे
11. आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
12. आंखों में दिल खुले हों तो मौसम की क़ैद क्या
फ़स्ल-ए-बहार ही में बहार आए ये नहीं
13. आंखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
14. मैं सो भी जाऊं तो क्या मेरी बंद आंखों में
तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे
15. मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ
वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे
16. मैं सोचता था कि लौटूंगा अजनबी की तरह
ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है मुझे
17. आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से
चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम
18. कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो
19. हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले
लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं
20. सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं
21. उम्र-भर क़त्ल हुआ हूं मैं तुम्हारी ख़ातिर
आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ यारों
बता दें कि जां निसार अख्तर प्रसिद्ध ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. की डिग्री ली थी। 1947 में विभाजन के पहले वह ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर भी रहे और फिर सन 1956 तक भोपाल के हमीदिया कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे।
