History of Kanchi Silk: करीब 1000 साल पहले की बात है। उन दिनों रेशम का व्यापार खूब लाभकारी और प्रतिष्ठित माना जाता था। भारत में भी सिल्क बनता था लेकिन वो ऐसा दौर था जब चीन का रेशम के व्यापार पर दबदबा था। दुनिया भर में चीन के रेशम पहुंचते। उसी समय दक्षिण भारत में एक ऐसा राजा हुआ जिसने सिल्क ट्रेड में चीन के दबदबे का दम निकाल दिया। यही राजा है जिसकी वजह से कांची सिल्क आज भारत की पहचान बना हुआ है। इन राजा का नाम था राजा चोल प्रथम।
राजा चोल प्रथम ने 985 ईस्वी में सिंहासन संभाला। चोल साम्राज्य समुद्री व्यापार और सैन्य शक्ति दोनों के कारण हमेशा से समृद्ध रहा। राजा चोल प्रथम को व्यापार की अच्छी समझ थी। वो बहुत जल्द समझ गए कि रेशम के व्यापार में चीन की दादागिरी खत्म करनी ही होगी। उन्होंने इसके लिए 500 कारीगरों को कांचीपुरम में बसाया।
ये सारे कारीगर तब के सौराष्ट्र से बुलाए गए थे। इनकी खासियत ये थी कि ये सब रेशम का काम जानते थे। इन लोगों को धन-दौलत से लेकर रेशम का कपड़ा बनाने का हर जरूरी सामान मुहैया कराया गया। उनके लिए विशेष बुनकर बस्तियां बनवाई गईं। उन्हें जमीन दी गई। रेशम के कीड़े पालने के लिए बाग भी दिए गए। यहीं से कारीगरों ने रेशम का ऐसी वैरायटी तैयार की जिसे आज कांची सिल्क के नाम से जाना जाता है।
जब कांची सिल्क राजा चोल प्रथम ने देखा तो उनके होश उड़ गए। ये बेहद कमाल के थे। अपनी खुशी के लिए उन्होंने खुद तंजावुर के प्रसिद्ध ब्रिहदीश्वर मंदिर में देवी की मूर्तियों को कांची सिल्क से सजा दिया। आगे चलकर हमेशा मंदिर की देवियों पर कांची सिल्क के पट ही चढ़ाए जाते रहे।
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कांची सिल्क का व्यापार होने लगा। भारत के दूसरे राज्यों के लोग कांची सिल्क खरीदने लगे। धीरे-धीरे विदेशी व्यापारी भी कांची सिल्क के मुरीद हो गए। चीन चिढ़ने लगा। उसके रेशम की डिमांड घटने लगी। भारत में कई जगहों पर रेशम के कपड़े बनने लगे। और इस तरह से रेशम के व्यापार में भारत भी चीन के सामने बराबरी से खड़ा हो गया।
कितनी खास है कांची सिल्क से बनी साड़ियां
कांचीपुरम को 'सिटी ऑफ टेम्पल्स' यानी मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां के विशाल मंदिरों की वास्तुकला का असर कांचीपुरम सिल्क साड़ियों पर भी साफ दिखाई देता है। इन साड़ियों के बॉर्डर और पल्लू पर बने डिजाइन मंदिरों के गोपुरम, मोर, कमल, आम, रुद्राक्ष और दूसरे पारंपरिक प्रतीकों से प्रेरित होते हैं।
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कांचीपुरम सिल्क साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत उनकी मजबूती और शुद्ध रेशम है। इन साड़ियों में शरीर, बॉर्डर और पल्लू को अलग-अलग बुना जाता है और बाद में बेहद मजबूत तकनीक से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि वर्षों तक इस्तेमाल के बाद भी ये साड़ियां अपनी खूबसूरती और मजबूती बनाए रखती हैं।
इनमें शुद्ध रेशम के साथ सोने और चांदी की जरी का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि कांचीपुरम सिल्क को शादी-ब्याह और दूसरे शुभ अवसरों के लिए सबसे पसंदीदा साड़ियों में गिना जाता है। कई परिवारों में इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में संभालकर रखा जाता है।
