लंबी सफेद दाढ़ी, हाथ में बड़ा ब्रश, रंगों से भरे कैनवास उनकी पहचान थी। उनकी इस पहचान को मुकम्मल करने का काम करते थे उनके नंगे पैर। दुनिया उन्हें भारत का पिकासो कहती थी। हम बात कर रहे हैं हिंदुस्तान की मिट्टी से निकले सबसे मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन की। हुसैन उस शख्सियत का नाम है जिसने कभी पेट पालने के लिए फिल्मों के बिलबोर्ड तक पेंट किये। बदले में उन्हें प्रति वर्ग फुट के हिसाब से मेहनताना मिलता था। आगे चलकर उन्हीं हुसैन की एक-एक पेंटिंग लाखों-करोड़ों में बिकी।
एम एफ हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ। उनका बचपन आसान नहीं रहा। छोटी उम्र में मां का साया उठ गया। परिवार बाद में इंदौर आ गया। यहीं से शुरुआती पढ़ाई की। चित्रकारी का हुनर उनमें नासमझी के दिनों से ही था। इसी हुनर के साथ वो कुछ बड़ा करने मुंबई पहुंचे। लेकिन जैसा कि सब जानते हैं, मुंबई इतनी आसानी से किसी को नहीं अपनाती। हुसैन को भी खूब संघर्ष करना पड़ा।
संघर्ष ऐसा कि उन्हें फिल्मों के पोस्टर और बिल बोर्ड भी पेंट करने पड़े। कई रातें फुटपाथ पर गुजरीं। खिलौने और फर्नीचर पेंट किये। लेकिन एक बात थी कि हालात चाहे जैसे भी रहे हुसैन का ब्रश कभी नहीं रुका। वह अपनी कल्पना की मिट्टी से कलाकारी करते रहे और उसमें रंग भरते रहे। आगे चलकर वही हुआ जिसके वो सही मायने में हकदार थे। उनके रंग बिखरने लगे। हर किसी पर एम एफ हुसैन का रंग चढ़ने लगा। देखते-देखते वो देश के सबसे बड़े चित्रकार बन गए।
मकबूल फिदा हुसैन (Photo: MF Hussain fb Page)
हुसैन: क्लास और कीमत की पहचान
किसी भी पेंटिंग पर हुसैन के हस्ताक्षर ही उसके कीमती और क्लासी होने का पैमाना बन गए। फिर क्या मुंबई और क्या मेलबर्न, पूरी दुनिया में एम एफ हुसैन के रंग नजर आने लगे। अपनी आत्मकथा 'M F Husain: Where Art Thou' में एमएफ हुसैन ने लिखा है कि उन्हें खाली बैठने से कोफ्त होती थी। इसीलिए अगर वो कुछ नहीं करते तो पेंटिंग कर रहे होते। 1950 के बाद वो दिल्ली शिफ्ट हो गए।
दिल्ली के ताज होटल में उन्होंने अपना स्टूडियो बनाया और जंगपुरा एक्सटेंशन में रहने लगे। वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सांसद शाहिद सिद्दीकी कभी हुसैन के पड़ोसी हुआ करते थे। बकौल सिद्दीकी हुसैन पूरे दिन कुछ ना कुछ पेंट करते रहते। एक दिन उन्होंने देखा कि हुसैन अपनी सफेद चमचमाती फिएट कार को पेंट कर रहे हैं। उन्हें लगा कि ये कैसा आदमी है जो अपनी इतनी महंगी गाड़ी को खुद ही खराब कर रहा है। वो हुसैन के पास पहुंच गए और पूछ बैठे- ये क्या कर रहे हैं आप। हुसैन ने उन्हें अपने रंगों की बाल्टी थमाते हुए कहा- इसे पकड़ो पहले।
हुसैन की पेंटिंग (Photo: M F Hussain Fb page)
सिद्दीकी बाल्टी लिये खड़े रहे और हुसैन गाड़ी पर पेंटिंग बनाते रहे। उन्होंने तीन घोड़े वाली पेंटिंग बनाई। ये घोड़े आगे चलकर हुसैन की पेंटिंग और उनकी गाड़ी की पहचान बन गए। 1986 में जब राजीव गांधी ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया तो संसद में भी वह चित्रकारी करते रहते। बतौर सांसद अपने 6 साल के कार्यकाल में उन्होंने जितनी भी पेंटिंग बनाई उन्हें बाद में संसद उपनिषद नाम से प्रकाशित भी किया।
मुक्तिबोध की मौत और हुसैन का त्याग
एमएफ हुसैन को जानने वाले बताते हैं कि वो यारों के यार थे। जिससे दोस्ती करते उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते। उनके दोस्तों की फेहरिस्त में मशहूर साहित्यकार मुक्तिबोध का नाम भी शुमार था। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के महारथी और दोनों पक्के दोस्त। 1964 में दिल्ली में ही मुक्तिबोध का निधन हो गया। दोस्त की मौत से हुसैन को बड़ा सदमा लगा। उन्होंने अपने दोस्त को श्रद्धांजलि देते हुए हमेशा के लिए जूते चप्पल त्याग दिये और उसके बाद आजीवन नंगे पैर रहे।
एम एफ हुसैन की आत्मकथा
अपनी आत्मकथा में हुसैन ने खुद लिखा है कि जब वह मुक्तिबोध के अंतिम दर्शन कर उनके घर से निकले तो उन्होंने देखा उनके जूते बाहर से गायब हैं। अब ये कोई और उठा ले गया या फिर इधर उधर हो गए, पता नहीं। वह नंगे पैर अपनी गाड़ी तक पहुंचे और फिर उसमें बैठकर निकल गए। नंगे पैर चलते हुए उन्होंने तय किया कि आज से मैं कभी जूते चप्पल नहीं पहनूंगा। मेरे दोस्त को शायद यही असली श्रद्धांजलि होगी। हुसैन जब तक जिंदा रहे उन्होंने अपने इस त्याग को जारी रखा।
कोई उनसे सवाल पूछता कि आप नंगे पैर क्यों रहते हैं, तो वो हंसते हुए कई तरह के मजाक करते। किसी इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि एक बार वह दो अलग-अलग रंगों के जूते पहनकर अपने कई चित्रकार दोस्तों के से मिलने गए। किसी ने भी उनके जूतों पर गौर नहीं किया। हुसैन कहते कि मुझे लगा कि जब किसी का ध्यान जूतों पर जाना ही नहीं है तो फिर उसे पहने ही क्यों।
ऐसे ही कभी किसी से कह देते कि नंगे पैर रहने से वह जमीन से जुड़ा महसूस करते हैं, तो किसी से कहते कि इससे सेहत दुरुस्त रहती है। बतौर सांसद वो संसद में भी नंगे पैर ही जाया करते थे। अकसर कुर्ता या शर्ट पहनने वाले हुसैन जब विदेशी दौरों पर थ्री पीस सूट पहनते तब भी पैर नंगे ही रहते।
नंगे पैर ही राष्ट्रपति से लिया सम्मान
भारत सरकार ने हुसैन को तीनों पद्म सम्मानों से सम्मानित किया था। जब वह देश के राष्ट्रपति से पद्म पुरस्कार लेने राष्ट्रपति भवन पहुंचे तब भी नंगे पैर ही थे। बहुत से लोगों ने इस पर आपत्ति भी जताई थी। ऐसे लोगों का कहना है कि राष्ट्रपति के सामने प्रोटोकॉल फॉलो करना चाहिए। लेकिन हुसैन ऐसे ही थे। उन्होंने हमेशा वही किया जो उन्हें ठीक लगा। इसी मिजाज के कारण जिस देश ने उनकी कला का सम्मान करते हुए उन्हें देश की संसद का सदस्य बनाया, उसी देश ने उनकी कला पर आपत्ति जताते हुए उन्हें देश के बाहर भी निकाल दिया।
ब्रिटेन में सुपुर्-ए-खाक हुए हुसैन
हिंदू देवी देवताओं की नग्न पेंटिंग बनाने के आरोप में उनपर कई मुकदमे दर्ज हुए। बाद में उन्हें देश छोड़ना पड़ा। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वह लंदन में रहे और वहीं पर दम तोड़ दिया। भारत की मिट्टी से निकले हुसैन को मौत के बाद अपनी मिट्टी भी नसीब नहीं हुई। ये बात अलग है कि अब भी दुनिया उन्हें पिकासो ऑफ इंडिया ही मानती है।
