Weather Women of India: भारत के कई राज्यों में मानसून आफत बनकर आया है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई भी लगतार हो रही बारिश से बेहाल है। जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त है। लोगों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में बारिश और परेशानी बढ़ा सकता है। लोग खुद को सुरक्षित रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। अब जरा सोचिए, क्या होता होगा तब जब हम पहले से मौसम का मिजाज नहीं भांप पाते थे।
जब तूफान ने बॉम्बे में मचाई तबाही
1947 में जब भारत आजाद हुआ तब उसके पास अपनी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि वह मौसम का पूर्वानुमान लगा सके। किसानों को पता ही नहीं होता था कि बारिश होगी या सूखा पड़ेगा। उन्हें बड़ा नुकसान होता था। देश को आजाद हुए अभी साल भर ही बीते थे कि मुंबई में भयंकर तूफान आया। इस तूफान ने पूरे शहर में तबाही मचा दी। करीब 38 लोगों की मौत के साथ सैकड़ों लोग हताहत हुए। आज भी उस तूफान को याद कर मुंबई के पुराने लोग सहम जाते हैं।
इस तूफान की अगली सुबह 22 नवंबर 1948 को अखबारों में छपा - तूफान से पंगु हुई बंबई। ये खबर 30 साल की एक मलयाली लड़की ने भी पढ़ी। मौसम की मार से 38 मौतों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने ठान लिया कि वह कुछ ऐसा करेगी जिससे इस तरह की नौबत फिर कभी ना आए। विज्ञान का सहारा लेकर उस लड़की ने ऐसा कारनामा कर दिखाया कि वह हमेशा के लिए 'वेदर वूमन ऑफ इंडिया' के नाम से अमर हो गई। हम बात कर रहे हैं अन्ना मणि की।
टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित बॉम्बे तूफान की खबर
अन्ना मणि: वेदर वूमन ऑफ इंडिया
बहुत से लोग इस नाम से अनजान होंगे। लेकिन अगर ये एक नाम ना होता तो शायद आज भारत मौसम का पूर्वानुमान ना लगा पाता। अन्ना मणि उस दौर में वैज्ञानिक बनी थीं जब भारत में महिलाओं की साक्षरता दर करीब 1 प्रतिशत थी। साल 1918 में केरल के पीरूमेडू के संपन्न परिवार में जन्मीं अन्ना मणि बचपन से ही पढ़ने लिखने की शौकीन थीं।
अन्ना मणि की जीवनी Anna Mani: The Uncut Diamond के मुताबिक जब वह 8 साल की थीं तो अपने गांव की लाइब्रेरी की सारी मलयाली किताबें पढ़ चुकी थीं। 12 साल की होते-होते उन्होंने सारी अंग्रेजी की किताबें भी पढ़ डालीं। आपको जानकर हैरानी होगी कि 13 साल की अन्ना मणि के जन्मदिन पर उनके पिता ने उन्हें हीरे जड़े झुमके दिये तो उन्होंने लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि आप इतने महंगे झुमके की जगह में इंसाइक्लोपिडिया ब्रिटानिका खरीद दीजिए।
पढ़ाई के लिए अन्ना मणि की दीवानगी को देखते हुए उनके माता-पिता ने उन्हें खूब पढ़ाया। साल 1945 में उन्होंने लंदन के इम्पीरियल कॉलेज से मौसम विज्ञान में डिप्लोमा किया और वहीं रिसर्च करने लगीं। जब देश आजाद हुआ तो वह अपने वतन लौट आईं और पुणे में भारत का मौसम विभाग कार्यालय जॉइन कर लिया। यहां वह अपने ज्ञान और क्षमता के हिसाब से योगदान देने लगीं।
जब क्रांति लेकर आईं अन्ना मणि
फिर 21 नवंबर 1948 को मुंबई के उस तूफान और 38 लोगों की मौत ने अन्ना मणि को कुछ बड़ा करने की दिशा में धकेल दिया। अन्ना ने अपनी टीम के साथ मिलकर आने वाले कुछ ही सालों में 100 से ज्यादा ऐसे यंत्र बना दिये जिससे बारिश, हवा, धूप, आंधी, तूफान या फिर सूखे जैसी प्राकृतिक स्थितियों का पूर्वानुमान लगने लगा। यह अपने आप में एक क्रांति थी।
भारत जैसे देश में जहां की बहुसंख्यक आबादी खेती-किसानी करके अपना पेट पालती थी, वहां मौसम का पूर्वानुमान वरदान साबित हुआ। अन्ना मणि के इसी योगदान को देखते हुए देश ने उन्हें वेदर मून ऑफ इंडिया का नाम दिया।
अन्ना मणि ने देश को सिखाया मौसम का मिजाज पढ़ना
आगे बढ़ता रहा वेदर वूमन का कारवां
अन्ना मणि रुकना नहीं जानती थीं। वो आगे बढ़ती रहीं। अब उन्होंनेअपना ध्यान ओजोन लेयर पर लगाया। यहां भी उन्होंने ऐसा कुछ किया कि दुनिया में उनका डंका बजने लगा। ओजोन लेयर को मापने का यंत्र बना कर अन्ना ने भारत को दुनिया के सामने गर्व से खड़ा कर दिया।
1969 में अन्ना मणि भारतीय मौसम विभाग की पहली महिला उपनिदेशक बनीं। साल 1976 में वह रिटायर हो गईं। हालांकि वह सिर्फ नौकरी से रिटायर हुईं। रिटायरमेंट के बाद भी वह आगे बढ़ती रहीं। उन्होंने सोलर पावर पर तीन ऐसी किताबें लिखीं जिन्हें आज भी उस विषय का महाग्रंथ माना जाता है।
..और स्ट्रोक ने अन्ना की स्पीड पर लगा दिया फुल स्टॉप
लेकिन कभी ना रुकने वालीं अन्ना मणि के लिए साल 1994 ऐसा स्पीड ब्रेकर बनकर आया जिसके बाद उनकी स्पीड थम गई। इस साल अन्ना मणि को ब्रेन स्ट्रोक आया। उनकी जान तो बच गई लेकिन फिर वह कुछ कर ना पाईं। करीब सात सालों तक अपनी सेहत से जूझते हुए 2001 में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। 16 अगस्त की तारीख थी जब उन्होंने तिरुवनंतपुरम में आखिरी सांस ली।
ब्रेन स्ट्रोक ने रोत दी अन्ना मणि की रफ्तार
अन्ना मणि ने कभी शादी नहीं की। उन्होंने देश को अपना परिवार बनाया। इसे इतना कुछ दे गईं कि जिसकी उम्मीद कोई नहीं करता। मगर अफसोस कि आज भी बहुत से लोग उस अन्ना मणि के नाम से भी नावाकिफ हैं जिन्होंने सही मायने में भारत को बेहतर बनाने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। तो अगर कभी आपसे कोई कहे कि एक अकेली लड़की क्या कर सकती है तो उसे अन्ना मणि की शख्सियत से जरूर परिचय कराइएगा।
