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Agra Ka Petha: कहां से आई पेठे की मिठास, ताजमहल से जुड़ा है इतिहास, जानें शाहजहां का फरमान कैसे बन गया आगरा की पहचान

History of Petha Sweet: कुछ लोगों का मानना है कि पेठा महाभारत काल से चला आ रहा है। दरअसल जिस सफेद कद्दू से पेठा मिठाई बनती है उस फल को भी पेठा ही कहा जाता है। इसे महाभारत काल के समय में कुष्मांडू फल भी कहा जाता था। कुष्मांडू फल का इस्तेमाल एक औषधि के रूप में भी किया जाता था।

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कहां से आई पेठे की मिठास, ताजमहल से जुड़ा है इतिहास, जानें शाहजहां का फरमान कैसे बन गया आगरा की पहचान

History of Petha in Hindi: आगरा का नाम सुनते ही दो चीजें दिमाग में आती हैं। सबसे पहला नाम ताजमहल का आता है। मोहब्बत की अमर निशानी ताजमहल की पूरी दुनिया दीवानी है। दूसरा नाम जो जेहन में आता है वो है आगरे का पेठा। जी हां ताजमहल की तरह आगरा का पेठा भी बहुत प्रसिद्ध है। आगरा जाने वाला शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसने पेठे का स्वाद ना चखा हो। अब तो पेठा आगरा से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों में भी बनने और बिकने लगा है। ये बात और है कि जो स्वाद आगरा के पेठे का है वो शायद ही कहीं और के पेठे में मिले। वैसे क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पेठे का रस आप बड़े चाव से लेते हैं, आखिर सबसे पहले वह किसने बनाई। अगर नहीं, तो आज इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे आगरा के पेठे की कहानी:

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पेठा मिठाई

महाभारत काल में भी था पेठा!

पेठे को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पेठा महाभारत काल से चला आ रहा है। दरअसल जिस सफेद कद्दू से पेठा मिठाई बनती है उस फल को भी पेठा ही कहा जाता है। इसे महाभारत काल के समय में कुष्मांडू फल भी कहा जाता था। कुष्मांडू फल का इस्तेमाल एक औषधि के रूप में भी किया जाता था। आज भी पेठे के ढेर सारे स्वास्थ्य लाभ हैं। पीलिया, पेट की पथरी , लीवर, आंखों की रोशनी, बालों का झड़ना जैसी कई बीमारियों को ठीक करने में आज उसी पेठा का इस्तेमाल होता है जिसे महाभारत काल में कुष्मांडू कहा जाता था।

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पेठे का फल

ताजमहल से जुड़े पेठे के इतिहास की 3 कहानी

पहली कहानी

कुछ इतिहासकार बताते हैं कि पेठा मिठाई का इतिहास ताजमहल के निर्माण से जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि ताजमहल के निर्माण में करीब 22 साल लग गए थे। मजदूर दिन रात काम करते रहते थे। उन दिनों गर्मियों के मौसम में आगरा बहुत ज्यादा गर्म हो जाया करता था। गर्मी में मजदूरी करने से हर साल बड़ी संख्या में मजदूर बीमार पड़ जाते। इससे काम की रफ्तार पर भी ब्रेक लगता। बताया जाता है कि शाहजहां के फरमान पर ऐसे मिठाई की ईजाद की गई जो मजदूरों के लिए मीठे का काम भी करे और उन्हें गर्मी से राहत भी दे। शाहजहां के कहने पर पेठे के फल से यह पेठा मिठाई तैयार की गई।

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ताजमहल के मजदूर

दूसरी कहानी

एक कहानी यह भी प्रचलित है कि ताजमहल के निर्माण में लगे मजदूर एक ही तरह का खाना खाकर ऊब गए थे। उन लोगों ने शाहजहां तक अपनी तकलीफ पहुंचाई। शाहजहां से उन लोगों ने खाने में मीठे की भी मांग की। मजदूरों का मांग पर बस फिर क्या था शाहजहां ने अपने मास्टर आर्किटेक्ट, उस्ताद ईसा से मदद मांगी। मजदूरों की इच्छा पूरी करने के लिए ईसा एक पीर के पास गए, जिन्होंने ध्यान करते समय पेठे की विधि हासिल की और फिर उनकी बताई इस विधि से पेठे का ईजाद हुआ।

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ताजमहल का निर्णाण 22 सालों तक चला था

तीसरी कहानी

पेठे से जुड़ी तीसरी कहानी ताजमहल बनने के बाद से जुड़ी है। कहा जाता है कि ताजमहल जब पूरी तरह से बनकर तैयार हो गया तो शाहजहां ने अपने शाही रसोइयों को फरमान सुनाया कि कोई ऐसी मिठाई बनाई जाए जो ताजमहल के संगमरमर की तरह सफेद और धुंधली हो, ताजमहल की ही तरह वह मिठाई भी नायाब और शुद्ध हो। माना जाता है कि शाहजहां के हुक्म पर रसोइयों ने सफेद कद्दू (पेठा) के फल से मिठाई बनाने का तय किया। इसे बनाने के लिए उन्होंने सफेद कद्दू को टुकड़ों में काटकर इसे पानी में उबाला और फिर चीनी मिलाकर इसे मीठा स्वाद दिया गया। इस तरह सफेद कद्दू से बनी इस मिठाई का जन्म हुआ और इसे पेठा नाम दिया गया। हालांकि, इस बात की संभावना कम ही है, क्योंकि शाहजहां से जुड़ी कुक बुक्स जैसे नुस्खा-ए-शाहजहानी में पेठे का कोई जिक्र नहीं है।

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पेठे के फल से मिठाई

हालांकि तीनों कहानी में से हकीकत के सबसे करीब पहली कहानी नजर आती है। इस कहानी के पक्ष में कई इतिहासकारों ने अपने मत दिये हैं। वरिष्ठ इतिहासकार राजकिशोर का मानना है कि शाहजहां के काल में मजदूरों को गर्मी से बचाने के लिए पेठा मिठाई की खोज की गई थी। उनकी तरह कई इताहसकार मानते हैं कि गर्मी से मजदूर परेशान और कमजोर हो जाते थे। ताज महल बनाने वाले मरीजों को एनर्जी बूस्टर के तौर पर शाहजहां ने पेठा देने का फ़रमान दिया था। दरअसल पेठे की तासीर ठंडी होती है और इसमें भरपूर मात्रा में ग्लूकोज भी होता है। यह गर्मी में शरीर को डिहाइड्रेट नहीं होने देता था।

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ताजमहल के मजदूर

इतिहासकार नहीं है एकमत

वैसे पेठा मिठाई के इतिहास को मुगलों से जोड़ने को लेकर बहुत से इतिहासकार अपनी अलग राय रखते हैं। हालांकि उनके पास भी सटीक जानकारी नहीं है कि पेठा मिठाई का इतिहास कितना पुराना है। इन इतिहासकारों का मानना है कि पेठा मुगलों की देन नहीं है। दरअसल, मुगल दूध और मावा से भरपूर मिठाइयों को बनाना और खाना पसंद करते थे। जबकि पेठे को बनाने में कद्दू व लौकी का इस्तेमाल किया जाता है।

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शाहजहां के रसोइयों ने बनाई पेठा मिठाई

अब पेठे का इतिहास जो भी रहा हो लेकिन इस बात से इनकार तो नहीं किया जा सकता है कि स्वाद के मामले में पेठे का कोई जोड़ नहीं है। यह ऐसी मिठाई है जिसे बनाना जितना आसान है उतना ही ज्यादा यह सेहत के लिए लाभकारी भी होती है। पेठे की खास बात ये है कि इसमें काजू बादाम केसर जैसे महंगे ड्राई फ्रूट इस्तेमाल नहीं होते जिस कारण इसकी कीमत भी बाजार में दूसरी मिठाइयों के मुकाबले बहुत कम है। आज यह पेठा आगरा की पहचान बन चुका है। सिर्फ आगरा में ही करीब 56 तरह के पेठे बनते हैं। हर तरह के पेठे का अपना स्वाद।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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