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Gorakh Pandey Poems: समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई.., शब्दों से क्रांति की मिसाल है गोरख पांडेय की ये भोजपुरी कविता

Gorakh Pandey Poem (Samajwad Babua dheere Dheere Aai): गोरख पांडेय की यह कविता भोजपुरी में है। दरअसल जब साल 1969 में वह किसान आंदोलन से जुड़े तो उन्हें महसूस हुआ कि भोजपुरी में भी गीत लिखने चाहिए। बस फिर क्या था, उन्होंने भोजपुरी में ऐसे ऐसे गीत लिखे जो क्रांतिकारी सभाओं में आज भी बहुत जोश के साथ गुनगुनाया जाता है।

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Gorakh Pandey Poem in Hindi

Gorakh Pandey Poems in Hindi: गोरख पांडेय हिंदी साहित्य का एक ऐसा नाम है जिसके करीब शायद ही कोई पहुंच पाया हो। हिंदी काव्य-साहित्य में अपने क्रांतिधर्मी सृजन के लिए गोरख पांडेय हमेशा याद किये जाते रहेंगे। समकालीन हिंदी साहित्य के शायद ही किसी कवि को उतनी लोकप्रियता मिली हो, जितनी गोरख पांडेय को मिली। गोरख पांडेय सिर्फ कवि ही नहीं थे। वह सिर्फ कविताएं या गीत ही नहीं लिखते थे, बल्कि गंभीर विचारक भी थे। समाज और अपने आसपास के समय को लेकर सजग, सचेत और गंभीरता से अपनी बात रखने वाले विचारक थे। इरशाद के आज के अंक में आइए पढ़ते हैं गोरख पांडेय के कलम से निकली एक शानदार कविता:

Gorakh Pandey Kavita | Samajwad Babua dheere Dheere Aai ( समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई)

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई, आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई, जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई, रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई, लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई, गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई, बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

गोरख पांडेय की यह कविता भोजपुरी में है। दरअसल जब साल 1969 में वह किसान आंदोलन से जुड़े तो उन्हें महसूस हुआ कि भोजपुरी में भी गीत लिखने चाहिए। बस फिर क्या था, उन्होंने भोजपुरी में ऐसे ऐसे गीत लिखे जो क्रांतिकारी सभाओं में आज भी बहुत जोश के साथ गुनगुनाया जाता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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