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What is Fagua and Jogira: क्या होता है फगुआ और जोगीरा? इनके बिना अधूरी है यूपी बिहार की होली, Holi पर क्यों गाते हैं फगुआ, कैसे शुरू हुआ जोगीरा सा रा रा रा..

What is Fagua and Jogira in Hindi: अगर आप होली के आसपास पूर्वी यूपी और बिहार में हैं और आपके कान में झाल की थाप, हारमोनियम की साज और ढोलक के ताल पर यदि कोई लोक गीत सुनाई देता है तो समझ लिजिए वह फगुआ है। इन इलाकों में होली पर इसे गाने की परंपरा है।

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जोगीरा क्या होता है, होली पर क्यों गाते हैं फगुआ?

What is Fagua and Jogira in Hindi: होली का त्योहार मस्ती का पर्व है। लोग इसे सिर्फ रंगों से जोड़कर देखते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है। होली लोक संगीत का भी त्योहार है। खास तौर पर यूपी और बिहार में कुछ लोक कलाएं ऐसी हैं जो सिर्फ होली से ही जुड़ी हैं। आप बिहार जाएंगे तो देखेंगे कि वहां होली बिना फाग के नहीं मनती। फाग वहां की एक पारंपरिक लोकगीत है। इसे होली पर ही गाया जाता है। होली पर फाग के अलावा जोगीरा भी गाने की परंपरा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि क्या होता है फाग जिसे फगुआ भी कहते हैं और क्या चीज है जोगीरा जिसके बिना होली अधूरी मानी जाती है. आइए डालते हैं रोशनी

क्या होता है फाग या फगुआ ?

अगर आप होली के आसपास पूर्वी यूपी और बिहार में हैं और आपके कान में झाल की थाप, हारमोनियम की साज और ढोलक के ताल पर यदि कोई लोक गीत सुनाई देता है तो समझ लिजिए वह फगुआ है। इन इलाकों में होली पर इसे गाने की परंपरा है। होली के मौके पर गाए जाने वाले इस लोकगीत को फगुआ या फाग इसलिए कहा जाता है क्यों कि होली जिस महीने में पड़ती है उसे फाल्गुन कहते हैं। फाल्गुन से ही फगुआ बना है। फगुआ सिर्फ होली के मौके पर नहीं गाया जाता है। बसंत पंचमी से लेकर होली तक पूरे महीने फगुआ गाया जाता है।

क्यों गाते हैं फगुआ?

फाल्गुन मास में फगुआ गाने का अलग महत्व है। दरअसल पुराने जमाने के लोकगीत और लोक पर्व फसल और मौसम के हिसाब से गाए और मनाए जाते थे। फगुआ भी इसी से जुड़ा है। दरअसल फाल्गुन से पहले पतझड़ होता है। पतझड़ में पेड़ों के सारे पत्ते झड़ जाते हैं। पतझड़ के बाद प्रकृति में नई खूबसूरती के साथ नए पत्ते आते हैं और वह काफी खूबसूरत होते हैं। पतझड़ के बाद पेड़ों पर आए नए पत्तों को पुराने लोग प्रकृति का श्रृंगार मानते थे। फाल्गुन के महीने में प्रकृति अपने आप को पूरी तरह से नए रंग-बिरंगे पत्तों से रंग लेती है और इस फगुआ गीत के माध्यम से उस प्रकृति को बताया जाता है।

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फाल्गुन महीना प्रेम का महीना भी माना जाता है। भोजपुरी भाषा बोले जाने वाले क्षेत्रों में कई ऐसे मजाक के रिश्ते होते हैं जिसमें रंग लगाकर लोग अपने प्रेम का इजहार भी करते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा है। फगुआ में श्री कृष्ण और राधा के प्रेम को भी समेटा जाता है।

फगुआ की खासियत

फगुआ की खासियत ये है कि इसमें अश्लीलता की कोई जगह नहीं होती। फगुआ के जरिए किसी पर तभी तक तंज कसा जाता है या मजाक उड़ाया जाता है जब तक उसे बुरा ना लगे। दरअसल मस्ती मजाक में जैसे ही किसी को बुरा लगने लगता है वह अश्लील हो जाता है। हालांकि फगुआ में जमकर मस्ती मजाक होता है।

फगुआ के जरिए ईष्टों की होली का वर्णन भी किया जाता है। फाग के जरिए बताया जाता है कि कैसे बाबा हरिहरनाथ सोनपुर में होली खेलते हैं तो वहीं कान्हा बृज में और भगवान राम अवध में।

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क्या होता है जोगीरा (What is Jogira)

जोगीरा भी एक लोकगीत है जिसे फागुन में गाया जाता है। लेकिन यह फगुआ से काफी अलग होता है। दरअसल फगुआ बसंत पंचमी से होली तक, पूरे मास गाया जाता है। वहीं जोगी कास होली के मौके पर गाते हैं। जोगीरा गाने का चलन कैसे शुरू इसके बारे में तो कोई पुख्ता जानकारी नहीं है लेकिन गांव देहात के पुराने लोगों की मानें तो संभवतः योगियों की हठ साधना, वैराग्य और उलटबांसियों का मजाक उड़ाने के लिए इसकी शुरुआत हुई।

बता दें कि जब किसी भी गीत की पंक्ति के आखिरी में जब एक शब्द की समान सुर के साथ आवृति होती है तो उसे टेक कहते हैं। जोगीरा भी होली का वह लोकगीत है जिसमें हर दो लाइन के बाद जोगीरा सारारारा..बतौर टेक इस्तेमाल किया जाता है। जोगीरा एक तरह का समूह गान है जिसमें एक तरफ से सवाल पूछा जाता है तो दूसरी तरफ से उत्तर दिया जाता है। यह पूरी तरह से एक व्यंग्यात्मक गीत होता है, जिसमें मजाक, हंसी-मजाक और समाज की हल्की-फुल्की चुटकियां ली जाती हैं।

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जोगीरा की एक बानगी देखिए-

कै हाथ के धोती पहने कै हाथ लपेटा,

कै घाट का पानी पिए कै बाप का बेटा...

जोगीरा सा रा रा रा...

पांच हाथ के धोती पहने दो हाथ लपेटा,

एक घाट का पानी पिए एक बाप का बेटा...

जोगीरा सारा रा रा रा..

होली पर ही क्यों गाते हैं जोगीरा

जोगीरा बना है जोगी से। जोगी उसे कहते हैं जो हर तरह के सांसारिक मोह माया से मुक्त होते हैं। उनके लिए कोई छोटा बड़ा या गोरा काला नहीं होता। जोगी मलंग होते हैं। फकीर होते हैं। होली के साथ भी ऐसा ही कुछ है। जब होली के रंग उड़ते हैं तो वो ये नहीं देखते हैं कि कौन छोटा है कोन बड़ा। कौन ऊंच है कौन नीच। होली के रंग सारे भेद मिटा देते हैं। सब मस्ती के रंग में नजर आते हैं। लोग इस दिन मलंग बन जाते हैं। इसी फकीरी के कारण होली के दिन खूब जोगीरा गाया जाता है।

होली के दिन लोग दिल खोलकर अपनी बातें कह लेते हैं और इशारों-इशारों में अपनी भड़ास भी निकाल लेते हैं। इसी कारण होली पर हास्य का परंपरा शुरू हुई। जोगीरा इसी हास्य को समेटे हुए मस्ती और संगीत का एक अनूठा संगम है जो होली के लोकगीत के तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों में नजर आता है।

जोगीरा गाते हुए लोग एक दूसरे का खूब मजाक उड़ाते हैं। बड़े से बड़ा तंज मस्ती के साथ गाते हुए कस दिया जाता है। सामने वाले को बुरा ना लगे इसलिए हर दो चार लाइन के बाद ठहाके के साथ यह भी कह दिया जाता है कि बुरा न मानो होली है, जोगीरा सा रा रा रा…।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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