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'देर से चांद निकलना भी गलत लगता है..', आज की शायरी में छिपा है मोहब्बत का अलग रंग

Der se Chand Nikalna Bhi Galat lagta hai: यह शेर प्रेम की मासूम मगर खतरनाक सच्चाई को उजागर करता है। शायर जानता है कि यह रास्ता तकलीफों से भरा है, फिर भी वह उससे बच नहीं पाता। महबूब-परस्ती का यही अजाब है कि जहां इंसान खुद समझदार होते हुए भी भावनाओं के आगे हार मान लेता है।

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आज की शायरी: देर से चांद निकलना भी गलत लगता है (Photo: iStock)

Shayari of The Day (आज की शायरी): अहमद कमाल परवाजी उर्दू के बेहद शानदार शायरों में शुमार हैं। उनकी शायरी में मोहब्बत और जुनून की एक अलग ही बानगी नजर आती है। उन्होंने तमाम ऐसे शेर लिखे हैं जो आज भी खूब सुने और सुनाए जाते हैं। उनका एक ऐसा ही मशहूर शेर है जो प्रेम की उस गहरी और पीड़ादायक अवस्था को बयान करता है, जहां इंसान अपने महबूब में इस कदर डूब जाता है कि दुनिया की हर चीज उसी के पैमाने से नापी जाने लगती है। ये शेर कुछ यूं है:

मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब

देर से चांद निकलना भी गलत लगता है

शेर के पहले मिसरे में अहमद कमाल परवाजी स्वीकार करते हैं कि उन्हें मालूम है कि महबूब की इबादत करना आसान नहीं है। महबूब-परस्ती यानी प्रिय को पूजने जैसी भावना, जहां प्रेम साधारण लगाव नहीं, बल्कि जुनून बन जाता है। शायर जानता है कि ऐसा प्रेम सुख के साथ-साथ यातना भी देता है। इसमें बेचैनी, इंतजार, असुरक्षा और खुद से शिकायतें शामिल होती हैं। यह अजाब इसलिए है क्योंकि प्रेमी अपनी खुशी, सुकून और समय सब कुछ महबूब के इर्द-गिर्द रख देता है।

चांद उर्दू शायरी में अकसर महबूब का प्रतीक होता है। यहां चांद का देर से निकलना उस इंतजार की ओर इशारा है, जब प्रेमी को लगता है कि प्रिय ने आने में देर कर दी। यह देर इतनी खलने लगती है कि कुदरत का एक सामान्य नियम भी गलत लगने लगता है। यानी प्रेमी की संवेदनशीलता इतनी बढ़ जाती है कि वह हर चीज को अपने प्रेम के चश्मे से देखने लगता है।

इस शेर का भाव यह है कि जब इंसान प्रेम में पूरी तरह डूब जाता है, तो उसकी अपेक्षाएं भी असाधारण हो जाती हैं। उसे हर चीज समय पर, पूरी और परफेक्ट चाहिए, खासकर महबूब से जुड़ी हर बात। जरा सी देरी भी उसे चुभने लगती है, भले ही वह देरी स्वाभाविक ही क्यों न हो।

यह शेर प्रेम की मासूम मगर खतरनाक सच्चाई को उजागर करता है। शायर जानता है कि यह रास्ता तकलीफों से भरा है, फिर भी वह उससे बच नहीं पाता। महबूब-परस्ती का यही अजाब है कि जहां इंसान खुद समझदार होते हुए भी भावनाओं के आगे हार मान लेता है।

कुल मिलाकर, यह शेर बताता है कि प्रेम सिर्फ खुशी नहीं, बल्कि एक ऐसी मानसिक अवस्था है जहां इंतजार, बेचैनी और शिकायतें भी प्रेम का हिस्सा बन जाती हैं और दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज चांद भी अगर देर से निकले, तो गलत लगने लगती है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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