CJP Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर पर जमा युवाओं की भीड़ और हाथों में लहराते पोस्टर फिलहाल सोशल मीडिया पर वायरल हैं ।कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं में धांधली और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे जैसी मांगों के लिए किया जा रहा है। सड़कों पर उतरे सैंकड़ों युवा अपने फोन से पुलिस बैरिकेड्स और नारों का जो सीधा प्रसारण कर रहे हैं, उससे सिस्टम को लेकर उनकी निराशा और अविश्वास सामने आ रहा है।
यह जनाक्रोश NEET जैसे पेपर्स के लीक होने के बाद शुरू हुआ है। हालांकि हमारे देश में पेपर लीक कोई नए मामले नहीं हैं। पिछले 40 वर्षों से तमाम एंट्रेंस एग्जाम के पेपर लीक होते आए हैं। बोर्ड परीक्षाएं भी इसका अपवाद नहीं हैं। लेकिन इस बार जिस तरह सड़कों पर यूथ उतर आया है- उस पर चाणक्य नीति क्या कहती है, जानते हैं।
जनाक्रोश पर क्या कहती है चाणक्य नीति
चाणक्य नीति में कई गईं कौटिल्य की बातें यही इशारा करती हैं कि असंतोष एकदम से नहीं उभरता, इसकी जड़ें बहुत पहले गहरी होने लगती हैं। बार-बार रद्द होती परीक्षाएं, पेपर लीक के आरोप, सालों से लटकी भर्तियां और शिकायतों पर प्रशासनिक चुप्पी- ये छोटी-छोटी घटनाएं धीरे-धीरे उस भरोसे को खत्म कर देती हैं जिसके दम पर सामाजिक व्यवस्था टिकी होती है।
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में यह समझाया है कि प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्। यानी प्रजा के सुख में ही राजा का सुख और प्रजा के हित में ही राजा का हित निहित होता है। यानी एक शासक की वास्तविक सफलता उसके निजी लाभ या वैभव में नहीं, बल्कि जनता की खुशहाली, सुरक्षा और कल्याण में होती है।
इसी भाव को अगर हम CJP के प्रदर्शन से जोड़ते हैं तो इसके जरिए युवा केवल एक नौकरी या परीक्षा का परिणाम नहीं मांग रहा। उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या उसकी बरसों की मेहनत निष्पक्ष तरीके से आंकी जाएगी? जब उसे लगता है कि उसकी मेहनत कोई दिशा नहीं मिल रही और प्रतियोगिता में उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का सही मौका नहीं मिल रहा है तो वह हताश और आक्रोशित हो जाता है।
बात सिर्फ मौजूदा सरकार की नहीं है। बल्कि अक्सर सत्ता संवाद से कतराती है। देश या पार्टी कोई भी हो, हर सत्ताधारी को लगता है कि कहीं बातचीत को उसकी लाचारी या कमजोरी न समझ लिया जाए। लेकिन चाणक्य की व्यावहारिक राजनीति इसके ठीक उलट सिखाती है। इसके अनुसार, एक दूरदर्शी शासक संकट के विकराल होने का इंतजार नहीं करता। वह असंतोष के शुरुआती संकेतों को पहचानकर तुरंत सही प्रतिनिधियों से संवाद स्थापित करता है। संवाद का अर्थ घुटने टेकना या हर बेतुकी मांग को मान लेना नहीं है। इसका सीधा अर्थ है- पारदर्शिता। सरकार यह साफ करे कि गड़बड़ी कहां हुई, जांच की समयसीमा क्या है और दोषियों पर क्या कार्रवाई होगी।
यह भी सच है कि हर बड़े जनांदोलन के आसपास राजनीतिक दल और विभिन्न संगठन अपनी रोटियां सेंकने का प्रयास करते हैं। CJP के प्रदर्शन को भी विपक्षी दलों और किसान संगठनों का समर्थन मिला है। लेकिन किसी आंदोलन के राजनीतिक रंग ले लेने से युवाओं के मूल सवाल खारिज नहीं हो जाते। एक परिपक्व सत्ता का काम समर्थकों की नीयत जांचने से ज्यादा, उठाए गए सवालों की सच्चाई को परखना है।
वहीं, यह जिम्मेदारी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे युवाओं पर भी उतनी ही लागू होती है। हिंसा, तोड़फोड़ या उपद्रव से किसी भी जायज मांग की नैतिक ताकत खत्म हो जाती है। चाणक्य नीति में भी दंड का विधान केवल अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए है, पूरे वर्ग या समुदाय के लिए नहीं। उपद्रवियों पर कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन मुट्ठी भर लोगों के आचरण के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को 'उपद्रवी' या 'राष्ट्रविरोधी' करार दे देना भी सही नहीं होता।
ऐसे में युवाओं का यह गुस्सा केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए एक मौका है खुद को सुधारने का। एक ऐसा सिस्टम बनाने का जहां हर स्टूडेंट को अच्छे और निष्पक्ष मौके मिलें। राह कठिन है इसलिए भरोसा दोनों पक्षों से होना जरूरी है।
