लाइफस्टाइल

आंसुओं की नहीं, इंकलाब की स्याही से लिखी गई थी गजल 'चुपके चुपके', जानें ट्रेन के उस सफर का किस्सा

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है ( Chupke Chupke Raat Din Lyrics) : यूं तो यह गजल बहुत पहले लिखी जा चुकी थी, लेकिन इसे घर-घर तक पहुंचाया 1982 में आई फिल्म 'निकाह' ने।

Image

चुपके चुपके रात दिन की दिलचस्प कहानी (Photo: AI Image)

Chupke Chupke Raat Din (चुपके चुपके रात दिन): जब भी अधूरी मोहब्बत या जुदाई के दर्द की बात होती है, तो गुलाम अली की आवाज में गाई गई गजल 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है' जेहन में अपने आप तैरने लगती है। 1982 में आई बॉलीवुड फिल्म 'निकाह' से मशहूर हुई यह गजल आज भी हर टूटे दिल की दवा मानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रूमानी गजल का जन्म किसी आलीशान महल या बाग में नहीं, बल्कि अंग्रेजों की बेड़ियों में कैद एक क्रांतिकारी के हाथों हुआ था? आइए जानते हैं इस कालजयी गजल के पीछे की वो कहानी, जो शायद ही आपको पता हो।

इंकलाब का नारा देने वाले की 'मोहब्बत'

इस गजल को लिखने वाला शख्स कोई मामूली शायर नहीं है। इसे अपने शब्दों से सजाया था मशहूर स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुस्तान के मुकम्मल शायर हसरत मोहानी ने। जी हां, वही हसरत मोहानी जिन्होंने देश को 'इंकलाब जिंदाबाद' जैसा बुलंद नारा दिया। 1 जनवरी 1875 को यूपी के उन्नाव में जन्मे सैय्यद फजल-उल-हसन जो आगे चलकर हसरत मोहानी कहलाए, बचपन से ही मेधावी थे और शायरी के शौकीन भी।

जेल, बगावत और वह सफर

किस्सा साल 1908 का है। हसरत मोहानी अपने अखबार 'उर्दू-ए-मोअल्ला' में ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ बेबाकी से लिखते थे। उनके एक लेख से अंग्रेज इतने चिढ़ गए कि उन्हें गिरफ्तार कर अलीगढ़ जेल भेज दिया गया। उन पर ₹500 का जुर्माना लगाया गया और माफी मांगने को कहा गया। लेकिन स्वाभिमानी मोहानी ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें अलीगढ़ से इलाहाबाद की नैनी सेंट्रल जेल भेजने का हुक्म हुआ।

बेड़ियों में कैद मोहानी ने छेड़ी मोहब्बत की धुन

कहा जाता है कि जब पुलिस दल उन्हें बेड़ियों में जकड़कर अलीगढ़ से नैनी ले जाने के लिए ट्रेन में बैठाया, तब उस शोर-शराबे और कैद के बीच भी हसरत मोहानी के भीतर का शायर जाग उठा। बेड़ियों की खनक और ट्रेन की गड़गड़ाहट के बीच उन्होंने कलम उठाई और कागज पर उतार दिए वो शब्द जो अमर हो गए:

"चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है,

हमको अब तक आशिकी का वो जमाना याद है..."

फिल्म 'निकाह' और गुलाम अली का जादू

यूं तो यह गजल बहुत पहले लिखी जा चुकी थी, लेकिन इसे घर-घर तक पहुंचाया 1982 में आई फिल्म 'निकाह' ने। पाकिस्तानी गजल सम्राट गुलाम अली की मखमली आवाज ने हसरत मोहानी के अल्फाजों में ऐसी जान फूंकी कि यह गजल अधूरी मोहब्बत का पर्याय बन गई।

इस गजल की खूबसूरती इसके उन छोटे-छोटे अहसासों में छुपी है, जैसे- दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए, वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है। इस गजल में ऐसी भावनाओं को शब्द दिये गए हैं कि सुनने वाले को लगता है कि यह तो उसी की कहानी है।

चुपके चुपके रात दिन लिरिक्स ( Chupke Chupke Raat Din Lyrics )

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..

तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा

तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा

और तेरा दांतों में वो उंगली दबाना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..

चोरी चोरी हमसे तुम आ कर मिले थे जिस जगह

चोरी चोरी हमसे तुम आ कर मिले थे जिस जगह

मुद्दतें गुजरी पर अब तक वो ठिकाना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..

खैंच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़तन

खैंच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़तन

और दुपट्टे से तेरा वो मुंह छुपाना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए

वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है..

हसरत मोहानी की इस कालजयी गजल 'चुपके चुपके रात दिन' की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और सच्चाई है। इसमें न कोई बनावट है और न ही दिखावा, बस दिल से निकले इश्क के असली जज्बात हैं। यही कारण है कि यह ग़जल पीढ़ियों से लोगों के दिलों पर अपना जादू बिखेर रही है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

और पढ़ें
End of Article