Bagaawat Shayari in Hindi: बगावत किसी चीज के खिलाफ होने से ज्यादा अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस है। यह उस चुप्पी को तोड़ने का नाम है, जो डर और दबाव में अकसर लोगों को जकड़ लेती है। जब इंसान अपने आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए आवाज उठाता है, वहीं से बगावत की शुरुआत होती है। इतिहास गवाह है कि हर बदलाव के पीछे किसी न किसी बगावत की चिंगारी रही है। बगावत हमें व्यवस्था को चुनौती देने और सवाल पूछने का हौसला देती है। इस बगावत पर कई मशहूर शेर लिखे गए हैं। आइए पढ़ते हैं बगावत पर शायरी हिंदी में:
1. कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आए
और कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी
- परवीन शाकिर
2. तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता
लफ़्ज़ सूझा तो मआ'नी ने बग़ावत कर दी
- अहमद नदीम क़ासमी
3. मैं बोलता हूं तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूं तो बड़ी बेबसी सी होती है
- बशीर बद्र
4. साहिल से सुना करते हैं लहरों की कहानी
ये ठहरे हुए लोग बग़ावत नहीं करते
- खुर्शीद अकबर
5. सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना
- हबीब जालिब
7.किसी आँख से छलका हुआ आँसू हूँ 'नबील'
मेरी ताईद ही क्या मेरी बग़ावत कैसी
- अज़ीज़ नबील
8. अपने ही ख़ून से इस तरह अदावत मत कर
ज़िंदा रहना है तो साँसों से बग़ावत मत कर
- अब्बास दाना
9. अपनी ये शान-ए-बग़ावत कोई देखे आ कर
मुँह से इंकार भी है और सर भी झुकाए हुए हैं
- ज़फ़र इक़बाल
10. दिल ने हर दौर में दुनिया से बग़ावत की है
दिल से तुम रस्म-ओ-रिवायात की बातें न करो
- अब्दुल मतीन नियाज़
11. जाने क्यूं रंग-ए-बग़ावत नहीं छुपने पाता
हम तो ख़ामोश भी हैं सर भी झुकाए हुए हैं
- सहर अंसारी
12. ज़रा सा शोर-ए-बग़ावत उठा और उस के बा'द
वज़ीर तख़्त पे बैठे थे और जेल में हम
- शोज़ेब काशिर
13. सौदा है ज़मीरों का हर गाम तिजारत है
चुप हूँ तो क़यामत है बोलूँ तो बग़ावत है
- गुलनार आफ़रीन
14. है यूँ कि कुछ तो बग़ावत-सिरिश्त हम भी हैं
सितम भी उस ने ज़रूरत से कुछ ज़ियादा किया
- बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
15. दो चार बरस जितने भी हैं जब्र ही सह लें
इस उम्र में अब हम से बग़ावत नहीं होती
- अकरम महमूद
16. अब मिरी तन्हाई भी मुझ से बग़ावत कर गई
कल यहाँ जो कुछ हुआ था सब फ़साना हो गया
- खालिद गनी
17. ये क्या कि हर वक़्त जी-हुज़ूरी में सर झुकाए खड़े हो 'अहया'
अगर बग़ावत का पर तुम्हारा भी फड़फड़ाए तो सर उठाओ
- अहया भोजपुरी
18. आज फिर शानों पे बिखरी ज़ुल्फ़ है अल्लाह ख़ैर
लग रहा है आज फिर अह्द-ए-बग़ावत कर लिया
- सफ़दर हमदानी
19. क्या है जो मुझे हुक्म नहीं मानने आते
दीवाना तो होता ही बग़ावत के लिए है
- अली ज़रयून
20. फिर वही ख़्वाब वही ज़िद नहीं 'आक़िब-साबिर'
हम उसूलों से बग़ावत नहीं करने वाले
- आक़िब साबिर
