आज का सुविचार (Guru Gobind Singh teachings on Veer Bal Diwas): आज 26 दिसंबर को हम 6 और 8 वर्ष की आयु के उन दो बच्चों की शहादत को प्रणाम करते हैं जिन्होंने अपने पिता की सिखाई बातों पर अमल करते हुए धर्म की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए। वीर बाल दिवस सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों की बाबा फतेह सिंह और जोरावर सिंह की शहादत को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। उनको नमन करते हुए ये बात भी मन में कौंधती है कि जिस पिता के पुत्र इतने वीर थे, वो व्यक्ति स्वयं कितना निर्भीक और पराक्रमी होगा। गुरु गोविंद जी की कई सीख आज भी हमारे लिए मिसाल हैं और अक्सर शिथिल पड़े राह ढूंढ रहे मन को नया रास्ता और हौसला दिखाती हैं।
गुरु गोविंद सिंह जी का ये वचन तो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं -
सवा लाख से एक लड़ाऊं,
चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं,
तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊ।
गुरु जी कहते हैं कि अगर एक सच्चे संकल्प वाला व्यक्ति खड़ा हो जाए, तो वह सवा लाख से भी टकरा सकता है। धर्म और सत्य की लड़ाई में अगर तुम अकेले भी हो तो डटे रहो। ये साहस और निडरता उन्होंने अपने साहबजादों में भी भरी और अपने अनुयायियों को भी यही संदेश दिया कि सामने वालों की संख्या से मत डरो। शक्ति संख्या में नहीं, बल्कि आत्मबल और उद्देश्य की पवित्रता में होती है। जब गुरु जी चिड़ियों से बाज तुड़ाने की बात कहते हैं तो यह असंभव को संभव बनाने की चेतना है। गुरु जी कहना चाहते हैं कि यदि संकल्प दृढ़ हो और आत्मा निर्भीक, तो साधारण-सा दिखने वाला व्यक्ति भी असाधारण सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है। यानी कमजोर को इतना आत्मविश्वास देना कि वह ताकतवर से भी आंख मिलाते हुए सीना तान कर खड़ा हो सके। उन्होंने अपना चरित्र सच्चा और धर्म की रक्षा के प्रति समर्पित रखने का संदेश दिया है।
अंतिम पंक्ति में गुरु जी स्पष्ट करते हैं कि उनका नाम और पहचान तभी सार्थक है, जब वे अपने वचनों पर खरे उतरें। यह अहंकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भाव है कि नेतृत्व वही कर सकता है, जो अपने आदर्शों को कर्म में उतारे।
Also Read: कोहली को कैसे मिली 'विराट' सफलता
गुरु गोविंद सिंह जी का एक और शबद है तो कर्म प्रधान और सही राह पर निडरता से चलने का संदेश देता है। इस शब्द कुछ इस तरह हैं -
देह शिवा बर मोहि इहै, सुभ करमन ते कबहूं न टरौं।
न डरौं अरि सों जब जाई लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं।
अरु सिख हों अपने ही मन को, इह लालच हउँ गुन तउँ उचरों।
जब आव की औध निधान बने, अति ही रण में तब जूझ मरौं।
इसका अर्थ है - हे शिव! मुझे ऐसा वरदान दो कि मैं कभी भी शुभ कर्मों से पीछे न हटूं। जब मैं शत्रु से युद्ध करने जाऊं तो किसी प्रकार का भय न हो और दृढ़ संकल्प के साथ विजय प्राप्त करूं। अपने मन को यही शिक्षा दूं कि किसी लालच में न फंस जाऊं और सदैव सद्गुणों का ही गुणगान करूं। और जब जीवन की अंतिम घड़ी आ जाए, तो मैं युद्धभूमि में साहसपूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त करूं। यानी यह कोई साधारण प्रार्थना नहीं, बल्कि निर्भीक जीवन का संकल्प है।
गुरु गोविंद सिंह जी की ये रचना बेशक कई सौ साल पुरानी है लेकिन आज भी उतनी ही प्रासंगिक है और हमें कर्तव्य के मार्ग पर अडिग होना सिखाती है। आप कभी भी अपने रास्ते में अकेले पड़ें, कभी भी आपको लगे कि आपके साथ चलने वाला कोई नहीं है- तो आप गुरु साहिब इस रचना को पढ़ें। आपको समझ में आएगा कि
- डर से ऊपर उठो
- शुभ कर्मों से कभी पीछे मत हटो
- संख्या नहीं, संकल्प देखो
- और जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाओ।
जब जीवन हर कदम पर संघर्ष है तो आप कष्टों, चुनौतियों, मुश्किलों की संख्या से मत घबराओ। अपना रास्ता बनाओ। अकेले आगे बढ़ना सीखे और अंत तक परमात्मा से ये प्रार्थना करते हुए डटे रहे कि वे आपका साहस बनाए रखें। यही जीवन का सही तरीका है और गुरु गोविंद सिंह जी की बहुमूल्य सीख भी।
