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आखिर कब और कैसे बना बिहार का उरुवेला क्षेत्र 'बोधगया'? जानें किन महापुरुषों से जुड़ा है इसका नाता

Bodh Gaya History: बिहार की धरती इतिहास, आस्था और प्राचीन ज्ञान की गहराई को अपने भीतर समेटे चलती है। इन्हीं विरासतों के बीच बोधगया वह जगह है, जहां शांति और आध्यात्मिकता जैसे हवा में घुली मिलती है। यहीं राजकुमार सिद्धार्थ ने बोधि वृक्ष तले ज्ञान प्राप्त कर गौतम बुद्ध का स्वरूप धारण किया था। समय के प्रवाह में यह स्थान महाबोधि मंदिर और आध्यात्मिक धरोहरों के साथ विश्व के सबसे सम्मानित तीर्थों में शामिल हो गया। ऐसे में आइए जानते हैं इस क्षेत्र के ऐतिहासिक सफर के बारे में।

History of Bodh Gaya

बोधगया का इतिहास

Bodh Gaya History: बिहार वह धरती है जहां इतिहास, अध्यात्म और लोक परंपराएं आज भी सांस लेती हैं। यहां की मिट्टी महावीर, बुद्ध और गुरुनानक जैसे महान व्यक्तित्वों के महान आदर्शों को समेटे हुए हैं। मिथिला की मधुबनी कला से लेकर भोजपुरी की ठेठ लोकधुनों तक, संस्कृति हर मोड़ पर बदलती नहीं खिलती है। लोक संगीत, छठ की भव्यता और ग्रामीण जीवन की सरलता, बिहार को अनोखी पहचान देती है। पुरातन विश्वविद्यालयों और राजवंशों की विरासत यहां की सीख और सभ्यता को और गहराई देती है।

इन्हीं में से एक है बोधगया (Bodh Gaya), जो बिहार के गया जिले में बसा वह आध्यात्मिक शहर है, जहां शांति की हवा खुद कहानी सुनाती है। यही वह धरती है जहां सिद्धार्थ ने बोधि वृक्ष (Bodhi Tree) तले ज्ञान प्राप्त कर गौतम बुद्ध (Gautam Buddha) बने, और तब से यह शहर बौद्ध दुनिया का केंद्र बन गया। महाबोधि मंदिर परिसर न केवल एक पवित्र स्थल है, बल्कि बोधगया की पहचान का दिल भी है, जहां दुनिया भर से साधक, यात्री और पर्यटक सालभर आते रहते हैं। प्राचीन मगध साम्राज्य की विरासत को समेटे यह शहर आज नेशनल हाईवे 83 पर आधुनिक यात्रा और आध्यात्मिक पर्यटन का प्रमुख जंक्शन है। यहां हर साल प्रबुद्ध सोसाइटी द्वारा आयोजित ज्ञान एवं सम्मान समारोह शहर की सांस्कृतिक पहचान में एक और परत जोड़ देता है, जिससे बोधगया सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सिटी हब बनकर उभरता है। साल 2002 में यूनेस्को ने इस शहर को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्रदान किया। ऐसे में आइए जानें इसका इतिहास।

History of Bodh Gaya (Photo: Canva)
बोधगया का इतिहास (फोटो: Canva)

उरुवेला से बोधगया का सफर

इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 528 ईसा पूर्व के वैशाख महीने में कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ ने सत्य की तलाश में अपना घर छोड़ दिया। ज्ञान की खोज उन्हें निरंजना नदी के किनारे बसे शांत गांव उरुवेला ले आई। यहीं वह एक पीपल वृक्ष के नीचे कठोर साधना में लीन हो गए। कहा जाता है कि एक दिन गांव की युवती सुजाता उन्हें खीर और शहद भेंट करने आई। इस भोजन के बाद सिद्धार्थ ने फिर ध्यान लगाया, और कुछ ही समय में उनके भीतर छाए अज्ञान के बादल पूरी तरह हट गए। इसी क्षण उन्हें वह महान ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके बाद वे सिद्धार्थ या तपस्वी गौतम नहीं रहे वे बुद्ध बन चुके थे, वह व्यक्तित्व जिसे समस्त संसार को मार्ग दिखाना था।

ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध करीब सात सप्ताह तक उरुवेला के आसपास ही रुके और गहन चिंतन किया। इसके बाद वे वाराणसी के पास सारनाथ पहुंचे, जहां उन्होंने पहली बार अपने ज्ञान का उपदेश दिया। कुछ महीनों बाद वे दोबारा उरुवेला लौटे, जहां उनके पांच पुराने साधक-मित्र अपने शिष्यों के साथ उनसे मिलने आए और दीक्षा की प्रार्थना की। उन्हें दीक्षित करने के पश्चात बुद्ध राजगीर की ओर चले गए। इसके बाद बुद्ध के उरुवेला लौटने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद उरुवेला का नाम ऐतिहासिक पुस्तकों में लगभग गायब हो जाता है। आगे चलकर यह क्षेत्र संबोधि, वैज्रसना और महाबोधि जैसे नामों से पहचाना जाने लगा। “बोधगया” शब्द का उल्लेख लगभग अठारहवीं शताब्दी से मिलता है।

History of Bodh Gaya (Photo: Canva)
बोधगया का इतिहास (फोटो: Canva)

महाबोधि मंदिर और बुद्ध प्रतिमा

लोक मान्यता है कि महाबोधि मंदिर में स्थापित बुद्ध प्रतिमा का संबंध स्वयं बुद्ध से जुड़ा हुआ माना जाता है। कथा के अनुसार, जब मंदिर का निर्माण हो रहा था, तब भक्तों ने इसमें बुद्ध की एक सुन्दर मूर्ति स्थापित करने का निश्चय किया। लेकिन लंबे समय तक ऐसा कोई शिल्पकार नहीं मिला जो बुद्ध की दिव्य और आकर्षक प्रतिमा गढ़ सके। एक दिन अचानक एक अजनबी कलाकार वहां पहुंचा और मूर्ति बनाने की इच्छा जताई। उसने कुछ शर्तें भी रखीं उसे केवल एक बड़ा पत्थर का स्तंभ, एक दीपक दिया जाए, छह महीने का समय मिले, और इस अवधि में कोई भी मंदिर का द्वार न खोले। उसकी सभी शर्तें स्वीकार कर ली गईं।

हालांकि जिज्ञासा और उत्सुकता में डूबे गांववालों ने निर्धारित समय से चार दिन पहले ही मंदिर का दरवाजा खोल दिया। भीतर जो दृश्य था, वह अद्भुत था बुद्ध की अत्यंत मनोहर प्रतिमा स्थापित थी, जिसका प्रत्येक अंग सुरम्य दिख रहा था, बस छाती का हिस्सा अपूर्ण था, मानो अभी तराशा ही जा रहा हो। कुछ समय बाद एक बौद्ध भिक्षु वहीं रहने लगा। कहा जाता है कि एक रात बुद्ध उसके स्वप्न में प्रकट हुए और बताते हैं कि प्रतिमा का निर्माण उन्होंने स्वयं किया था। इस कारण यह मूर्ति पूरे बौद्ध जगत में अत्यधिक पूजनीय और प्रतिष्ठित मानी जाती है। नालंदा और विक्रमशिला के प्राचीन विहारों में भी इसी प्रतिमा की प्रतिकृतियां स्थापित की गईं।

बोधगया और सम्राट अशोक का जुड़ाव

प्राचीन उरुवेला में स्थित महाबोधि विहार, बोधगया में पवित्र बोधि वृक्ष यानी फिकस रिलिजियोसा और वज्रासन, जिसे ‘हीरा सिंहासन’ भी कहा जाता है, प्रमुख रूप से शामिल हैं। माना जाता है कि मूल मंदिर की स्थापना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने एक रेलिंग से घिरे वृक्ष-मंदिर के रूप में करवाई थी। इस प्राचीन संरचना की शुरुआती झलकियां भरहुत और सांची स्तूपों की नक्काशियों में दिखाई देती हैं। सम्राट अशोक ने उस स्थान को चिह्नित करने के लिए, जहां बुद्ध ने ध्यान लगाया था, लाल बलुआ पत्थर की एक विशेष संरचना खड़ी की थी, जिसके चारों ओर रेलिंग बनाई गई। बोधगया में मिले चीनी और बर्मी अभिलेखों से यह भी संकेत मिलता है कि बोधगया का यह मंदिर उन 84,000 धर्म-स्थलों में शामिल था, जिनके निर्माण का श्रेय राजा धर्मशोक (यानी अशोक) को दिया जाता है। इन शिलालेखों में यह भी उल्लेख है कि धर्मशोक जम्बूद्वीप के शासक थे और बुद्ध के निर्वाण के लगभग 218 वर्ष बाद उनका जन्म हुआ था। कहा जाता है कि, अशोक के बाद गुप्त राजाओं ने भी मंदिरों के निर्माण में सहायता की थी।

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 Nilesh Dwivedi
Nilesh Dwivedi Author

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अप... और देखें

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