Republic Day 2026: गणतंत्र दिवस पर क्यों होती है परेड, जानें कब शुरू हुआ ये सिलसिला?
- Authored by: Nilesh Dwivedi
- Updated Jan 26, 2026, 12:16 AM IST
Republic Day Parade History: जैसे ही गणतंत्र दिवस करीब आता है, देशभर में देशभक्ति और उत्साह की लहर दौड़ने लगती है। 26 जनवरी को होने वाली भव्य परेड भारत की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकता का अद्भुत प्रदर्शन होती है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि इस परेड की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई? ऐसे में आइए इसके इतिहास को समझते हैं।
Republic Day 2026: गणतंत्र दिवस पर क्यों होती है परेड, जानें कब शुरू हुआ ये सिलसिला?
Republic Day Parade History: जैसे-जैसे गणतंत्र दिवस की तिथि नजदीक आती है, पूरे देश में उत्साह और जोश का माहौल बनने लगता है। हर कोई 26 जनवरी का बेसब्री से इंतजार रहता है, क्योंकि इस दिन राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाली रिपब्लिक डे परेड में भारत की शक्ति, एकता और विविधता का भव्य प्रदर्शन होता है। राजपथ (कर्तव्य पथ) पर होने वाली यह परेड भारतीय सेना की शौर्य क्षमता, आधुनिक हथियारों और अनुशासन का जीवंत परिचय देती है।

गणतंत्र दिवस की परेड
इसके साथ-साथ विभिन्न राज्यों की रंग-बिरंगी झांकियां देश की सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और विकास की झलक प्रस्तुत करती हैं। स्कूलों के बच्चे, लोक कलाकार और एनसीसी कैडेट्स अपनी शानदार प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इस परेड की भव्यता इतनी आकर्षक होती है कि न सिर्फ देशवासी बल्कि विदेशी मेहमान भी इसे देखने के लिए आते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि, परेड का सिलसिला कब शुरू हुआ? या गणतंत्र दिवस पर ही ये क्यों होती है? अगर नहीं तो आइए जानें.....
26 जनवरी की तारीख का महत्व
26 जनवरी 1950 का दिन भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है, जब देश ने औपचारिक रूप से अपना संविधान लागू किया। लंबे संघर्ष और बलिदानों के बाद भारत न केवल स्वतंत्र राष्ट्र बना, बल्कि एक गणराज्य के रूप में भी स्थापित हुआ। लेकिन संविधान लागू करने के लिए 26 जनवरी की तिथि ही क्यों चुनी गई, इसके पीछे एक ऐतिहासिक कारण छिपा है। दरअसल, 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के दौरान ब्रिटिश सरकार से भारत को पूर्ण स्वराज का अधिकार देने की मांग की गई थी। इसी कड़ी में 26 जनवरी 1930 को रावी नदी के तट पर तिरंगा फहराकर स्वाधीनता का संकल्प लिया गया। इसके बाद यह दिन हर साल ‘पूर्ण स्वराज दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब संविधान को लागू करने का समय आया, तो उसी ऐतिहासिक परंपरा और संकल्प को सम्मान देते हुए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में चुना गया।

परेड का इतिहास
परेड का इतिहास
भारतीय गणतंत्र दिवस के साथ देश-विदेश में होने वाली सैन्य परेड का मूल उद्देश्य किसी भी राष्ट्र की शक्ति और सुरक्षा क्षमता को प्रदर्शित करना होता है। इसमें सेना की तैयारी, आधुनिक हथियारों और अनुशासन का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता है, जिससे आम नागरिकों में देश के प्रति सम्मान और गर्व की भावना उत्पन्न हो। साथ ही, यह अन्य देशों और संभावित शत्रुओं को अपनी सामरिक (Strategic/Tactical) मजबूती का संकेत देने का माध्यम भी रही है। हालांकि परेड की परंपरा कोई नई अवधारणा नहीं है। इसके शुरुआती उदाहरण प्राचीन मेसोपोटामिया सभ्यता में देखने को मिलते हैं। बाद में रोमन साम्राज्य में विजयी सेनानायक युद्ध जीतने के उपरांत भव्य जुलूस निकालते थे।
भारत में परेड की प्रेरणा
आधुनिक सैन्य परेड की शैली को प्राचीन प्रशिया, यानी आज के जर्मनी से प्रेरित माना जाता है। परेड में सैनिकों का सामने की ओर पैर उठाकर कदमताल करना इसकी खास पहचान है। यह शैली उस दौर में “गूज स्टेप” के नाम से जानी जाती थी, जिसे नाजी जर्मनी की सेना ने लोकप्रिय बनाया। भारत में ब्रिटिश शासन के समय परेड और जुलूस आम दृश्य थे। अंग्रेज इन आयोजनों के माध्यम से न केवल भारतीयों बल्कि पूरी दुनिया को अपनी सैन्य शक्ति का एहसास कराते थे, खासकर अपने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों के सामने। स्वतंत्रता के बाद भले ही अंग्रेज चले गए, लेकिन परेड की यह परंपरा भारत का हिस्सा बनकर रह गई।
कहां हुई थी पहली गणतंत्र दिवस परेड?
1950 से 1954 के बीच गणतंत्र दिवस परेड का आयोजन राजपथ पर नहीं किया जाता था। शुरुआत यह परेड अलग-अलग स्थानों पर आयोजित हुई, जैसे कभी इरविन स्टेडियम, कभी किंग्सवे कैंप और कभी रामलीला मैदान। साल 1950 में आयोजित पहले गणतंत्र दिवस समारोह में सिर्फ सैन्य टुकड़ियों की परेड शामिल थी, जबकि उस समय राज्यों की झांकियों की परंपरा शुरू नहीं हुई थी। साल 1953 एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया, जब सेना के साथ-साथ अन्य सशस्त्र बलों और कुछ राज्यों की झांकियों को पहली बार परेड का हिस्सा बनाया गया। इसके पीछे एक खास वजह थी।

परेड के दौरान राज्यों की झांकियों (फोटो: Wikimedia Commons)
राज्यों की झांकियों को किया गया शामिल
1950 के दशक में देश के विभिन्न हिस्सों में भाषाई आधार पर राज्यों के बीच मतभेद बढ़ रहा था। हर राज्य अपनी भाषा और संस्कृति की पहचान को सुरक्षित रखना चाहता था। ऐसे माहौल में गणतंत्र दिवस परेड के माध्यम से सभी राज्यों को एक मंच पर लाना राष्ट्रीय एकता का सशक्त संदेश बन सकता था। इसी लक्ष्य से राज्यों की झांकियों को शामिल किया गया, ताकि विविधताओं के बावजूद एकता को दर्शाया जा सके और राज्यों के बीच आपसी समझ, सहयोग और सकारात्मक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल सके।