सोचिए, भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच अगर आपको थोड़ा सा सुकून पाने के लिए एयर कंडीशनर या पंखा तक न मिले, तो क्या होगा? शायद आप गर्मी से उकताकर मौसम से लेकर किस्मत तक को कोसना शुरू कर देंगे और स्थिति अगर बिलकुल ठीक ना हो तो चंद घंटों में ही जान हलक में आ सकती है। लेकिन ये हालात दुनिया में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई काल्पनिक नहीं, बल्कि एक डरावनी और कड़वी सच्चाई है।
शिकागो विश्वविद्यालय के ऊर्जा नीति संस्थान (EPIC - Energy Policy Institute at the University of Chicago) के अंतर्गत कार्यरत 'क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब' की एक नई रिपोर्ट ने वैश्विक समुदाय की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट कुछ ऐसी है कि इस पर संस्कृत का यह कथन सटीक बैठता है- 'देवो दुर्बलघातकः' अर्थात देवता भी कमजोर के लिए ही घातक साबित होते हैं। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से साल 2050 तक हर साल लगभग 4 लाख 30 हजार अतिरिक्त लोगों की मौत होने का अनुमान है। लेकिन इस आंकड़े का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि इन मौतों में से लगभग 90% केवल गरीब और निम्न-आय वाले देशों में होंगी। इसका कारण सिर्फ भीषण गर्मी नहीं, बल्कि उस गर्मी से बचने के संसाधनों और बिजली का न होना है।
जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी 'विडंबना'
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन इस स्थिति को दुनिया की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक मानते हैं। वो कहते हैं कि एयर कंडीशनिंग जीवन रक्षक है और इसमें कोई शक नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण समृद्ध देशों में इसका इस्तेमाल निश्चित रूप से बढ़ेगा। लेकिन शोध बताता है कि दुनिया के अनेक गरीब देशों के लोग ऐसा नहीं कर पाएंगे। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन देशों का जलवायु परिवर्तन में या ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे कम योगदान रहा है, सबसे अधिक मौतें भी वहीं होंगी।
अमीर और विकसित देश, जो ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण फैलाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, उनके पास पैसे और बुनियादी ढांचे के दम पर खुद को AC और मॉडर्न कूलिंग सिस्टम में कैद करने की क्षमता है। दूसरी तरफ, निर्धन देश बिना किसी गलती के मौत के मुहाने पर खड़े हैं।
कूलिंग के लिए बिजली: मध्यम आय Vs निम्न आय वर्ग
जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कूलिंग के लिए बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। लेकिन बिजली की खपत में यह बढ़ोतरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बहुत असमान है। मध्यम आय वाले देशों की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र बढ़ रहे हैं। इसके चलते इन देशों में कूलिंग के लिए बिजली की खपत, निम्न आय वाले देशों की तुलना में 7 गुना अधिक बढ़ने का अनुमान है। वहीं निम्न आय वाले या गरीब देशों में स्थिति इतनी दयनीय है कि प्रति व्यक्ति बिजली की खपत में अनुमानित बढ़ोतरी इतनी कम होगी कि उससे केवल एक LED बल्ब को मात्र 4 महीने तक ही जलाया जा सके।
अब आप अंदाजा लगाइए कि जहां लोग एक छोटा बल्ब जलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां एयर कंडीशनर या कूलर चलाना कितना बड़ा सपना होगा।
18 देश और 67.6 करोड़ लोग 'दोहरे संकट' की चपेट में
रिपोर्ट में दुनिया के 18 ऐसे देशों के क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां 67.6 करोड़ लोग भीषण गर्मी और कूलिंग सुविधाओं के अभाव के दोहरे संकट में फंसे हुए हैं। अनुमान है कि बढ़ते तापमान और ऊर्जा की बेहद कम उपलब्धता के कारण, 2050 तक अकेले इन इलाकों में ही हर साल लगभग 3.77 लाख लोगों की जान जा सकती है।
अफ्रीका का साहेल क्षेत्र, नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड जैसे देश, जहां गरीबी और भीषण गर्मी दोनों चरम पर हैं, इन इलाकों में ज्यादा खतरा है, साथ ही भारत के पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार के कई बेहद घने और गरीब इलाके भी इस खतरे की चपेट में हैं।
उदाहरण से समझिए असमानता
जलवायु विषमता को समझने के लिए खाड़ी देशों और उप-सहारा अफ्रीका की तुलना सबसे सटीक उदाहरण है। कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में तापमान उतना ही अधिक और जानलेवा रहता है जितना कि अफ्रीका के सहारा मरुस्थल के आसपास के देशों में।
अंतर क्या है? खाड़ी देशों के पास भरपूर संसाधन, पैसा और निर्बाध बिजली आपूर्ति है। वे अपनी 90% से अधिक आबादी को एयर कंडीशनिंग की सुविधा दे सकते हैं। परिणाम यह होता है कि भयंकर गर्मी के बावजूद वहां गर्मी से होने वाली मौतें बहुत कम होती हैं। वहीं अफ्रीका के हाल की बात करें तो तापमान समान है, लेकिन बिजली और कूलिंग उपकरण न होने से लाखों लोग सीधे 'हीटस्ट्रोक' और गर्मी से होने वाली बीमारियों के शिकार बनते हैं।
'एडाप्टेशन रोडमैप': अब समय बहुत कम बचा है
यह रिपोर्ट ईपीआईसी (EPIC) की ’एडाप्टेशन रोडमैप’ (Adaptation Roadmap) शृंखला की दूसरी कड़ी है। इस रिपोर्ट का मुख्य संदेश यह है कि वैश्विक समुदाय सिर्फ "उत्सर्जन घटाने" की बातें करके नहीं बैठ सकता। समय का तकाजा है कि 'अनुकूलन' यानी एडाप्टेशन, आसान भाषा में कहें तो बदलती जलवायु के हिसाब से लोगों को ढालने और बचाने को भी वैश्विक रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया जाए। ग्रीनस्टोन के अनुसार, विकासशील और गरीब देशों के पास अपनी बिजली व्यवस्था को सस्ती, टिकाऊ और भरोसेमंद बनाने के लिए बहुत कम समय बचा है। अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तुरंत गरीब देशों को सस्ती ऊर्जा, कूलिंग टेक्नोलॉजी और आर्थिक मदद नहीं की, तो 2050 तक आने वाली मौतों की यह सुनामी इतिहास के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक बन जाएगी।