BJP-TMC Relation : कहा जाता है कि राजनीति में समय, लोग और रिश्ते कभी स्थिर नहीं रहते। ये बदलते रहते हैं। भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच इसी तरह का रिश्ता रहा है। कभी केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार में शामिल रहने और 2006 में उसके साथ मिलकर बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ने वाली टीएमसी का आज भगवा पार्टी से 36 का आंकड़ा है। बंगाल में दोनों पार्टियां आमने-सामने हैं। भाजपा उससे सत्ता छीन सकती है। दोनों पार्टियों के रिश्ते की अगर बात करें तो यह खट्टे-मीठे अनुभव वाला रहा है।
वाजपेयी की एनडीए सरकार में रेल मंत्री थीं ममता
साल 1998 से 2006 तक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जो सरकार थी, टीएमसी उसका हिस्सा रही। एनडीए की इस सरकार में ममता रेल मंत्री थीं। हालांकि, तहलका प्रकरण को लेकर ममता की पार्टी 2001 में अलग भी हुई। यही नहीं, 2006 का विधानसभा चुनाव भी टीएमसी ने भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ा था।
जब 2000 में ममता के कालीघाट वाले घर पहुंचे वाजपेयी
यह 6 जुलाई 2000 की शाम थी। कोलकाता में सूरज ढल रहा था, लेकिन कालीघाट की संकरी हरिश चटर्जी स्ट्रीट पर स्थित एक अर्ध-पक्के घर में चहलकदमी बढ़ गई थी। मालपुआ बन रहा था, मोहल्ले की महिलाएं शंख लेकर तैयार खड़ी थीं। उस समय की रेल मंत्री ममता बनर्जी की 70 वर्षीय मां गायत्री देवी एक खास मेहमान का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं और वह मेहमान कोई और नहीं बल्कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। वहां पहुंचते ही वाजपेयी ने अपनी कैबिनेट सहयोगी का अभिवादन किया और गायत्री देवी के चरण स्पर्श किए। गायत्री देवी ने उन्हें एक गुलाब और रेशमी दुपट्टा भेंट किया। शंखनाद गूंज उठा और संकरी गली जयकारों से भर गई।
संकट के समय वाजपेयी के साथ मजबूती के साथ खड़ी रहीं ममता
ममता बनर्जी के घर वाजपेयी की यह यात्रा उस रिश्ते की गहराई को दर्शाती थी, जो व्यक्तिगत, संरक्षण देने वाला, स्नेहपूर्ण, भरोसेमंद, राजनीतिक रूप से व्यावहारिक और भावनात्मक रूप से गर्मजोशी भरा था। आज 2025 के नजरिए से देखें तो तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और भाजपा के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच समीकरण कुछ दूसरी तरह का है। इससे एक साल पहले, जब अप्रैल 1999 में वाजपेयी की 13 महीने पुरानी एनडीए सरकार एक वोट से गिर गई थी और गठबंधन में उनके बिना आगे बढ़ने की बात भी उठी थी, तब ममता बनर्जी उन नेताओं में शामिल थीं जिन्होंने मजबूती से वाजपेयी का साथ दिया। यह रुख वाइको और नवीन पटनायक ने भी अपनाया था। इस बात का जिक्र वाजपेयी के पूर्व मीडिया सलाहकार अशोक टंडन ने अपनी किताब अटल संस्मरण में किया है।
अटल जी सहयोगी दलों की बात ध्यान से सुनते थे-ममता
वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स में हुआ। इसी साल वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने उनके घर आईं ममता ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा अपने सहयोगी दलों की बात ध्यान से सुनते थे। यही उनका काम करने का तरीका था। उन्होंने कहा, 'हमने साथ काम किया है। हमने उनकी सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। वह सभी के साथ मिलकर काम करते थे। यही उनकी शैली थी। वह हमेशा हमारी बात सुनते थे। नीतीश कुमार, जे. जयललिता, नवीन पटनायक हम सब साथ थे। हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था।' बनर्जी ने कहा कि 2011 में जब वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं और वाजपेयी से मिलने गईं, तो वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकीं। उन्होंने कहा, 'वह मुझसे कुछ कहना चाहते थे, लेकिन कह नहीं पाए। मैं उनकी बेटी के संपर्क में रहती थी।'
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