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नंदीग्राम: कैसे एक घटना ने हमेशा के लिए बदल दी बंगाल की सियासत, लेफ्ट के 34 साल के शासन को ममता ने उखाड़ फेंका

Story of Nandigram : 2006 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा ने मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के औद्योगिक पुनरुत्थान के वादे के दम पर भारी जीत दर्ज करते हुए लगातार सातवीं बार सत्ता हासिल की। विपक्ष, जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस कर रही थी, लगभग पूरी तरह कमजोर हो गया था

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नंदीग्राम की घटना से बदल गई बंगाल की राजनीति
Written by: Alok Rao
Updated May 4, 2026, 05:04 IST
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Story of Nandigram : नंदीग्राम की एक घटना ने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह से बदल दिया। पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम में 14 मार्च 2007 को हुए गोलीकांड में पुलिस फायरिंग में दो महिलाओं समेत 14 ग्रामीण मारे गए। ये ग्रामीण वाम मोर्चा सरकार द्वारा केमिकल हब स्थापित करने के लिए भूमि अधिग्रहण की अफवाहों के खिलाफ विरोध कर रहे थे। इस घटना ने डेढ़ साल से अधिक समय तक चलने वाले हिंसक आंदोलन को जन्म दिया और राज्य में वाम मोर्चा शासन के अंत को तेज कर दिया। इसका भूमि अधिग्रहण की सरकारी नीतियों पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ा।

पुलिस फायरिंग ने बदल दिया राजनीतिक समीकरण

2006 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा ने मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के औद्योगिक पुनरुत्थान के वादे के दम पर भारी जीत दर्ज करते हुए लगातार सातवीं बार सत्ता हासिल की। विपक्ष, जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस कर रही थी, लगभग पूरी तरह कमजोर हो गया था लेकिन नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग ने राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल दिया। जबरन भूमि अधिग्रहण का मुद्दा बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गया। ममता बनर्जी पहले ही हुगली जिले के सिंगूर के किसानों के समर्थन में उतर चुकी थीं, जो टाटा मोटर्स की छोटी कार परियोजना के लिए अपनी जमीन लिए जाने का विरोध कर रहे थे। उन्होंने दिसंबर 2006 में कोलकाता में 26 दिनों का ऐतिहासिक अनशन भी किया था।

2007 में क्या हुआ था

पूर्व मेदिनीपुर जिला एक कृषि-प्रधान इलाका है। यहां का नंदीग्राम 2007 की शुरुआत में ही सीपीएम के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के उस फैसले के खिलाफ विद्रोह में उठ खड़ा हुआ, जिसमें विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण की योजना थी। भूमि अधिग्रहण के आधिकारिक नोटिस के बाद 7 जनवरी की सुबह ही हिंसा भड़क उठी। अलग-अलग धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं के किसान अपनी जमीन किसी भी हालत में न देने के लिए एकजुट थे। स्थिति तब और भड़क गई जब खबर मिली कि सशस्त्र सीपीएम कार्यकर्ता किसानों को सबक सिखाने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं। उस दिन की गोलीबारी में तीन युवक भरत मंडल, शेख सलीम और बिस्वजीत माइती मारे गए। दूसरी ओर, स्थानीय सीपीएम नेता शंकर सामंत को गुस्साए ग्रामीणों ने जिंदा जला दिया। यहीं से नंदीग्राम किसान आंदोलन की शुरुआत हुई, जो पूरे साल चला और 2011 में वाम मोर्चा सरकार के पतन का एक बड़ा कारण बना। इस आंदोलन में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

एक साल पहले सिंगूर ने तैयार कर दी आंदोलन की जमीन

नंदीग्राम ने एक साल पहले हुए सिंगूर आंदोलन से सबक लिया था, जहां किसानों ने टाटा मोटर्स के नैनो कार प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध किया था। 2 दिसंबर 2006 को पुलिस ने बल प्रयोग कर जमीन पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद नंदीग्राम के किसानों ने सड़कों को खोदकर और बैरिकेड लगाकर पुलिस को गांवों में घुसने से रोक दिया। करीब तीन महीनों तक नंदीग्राम लगभग 'पुलिस-मुक्त क्षेत्र' बन गया, जहां केवल पत्रकार, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता ही जा सकते थे। हालांकि यह समय शांतिपूर्ण नहीं था। खेजुरी, जो सीपीएम का गढ़ माना जाता था, की ओर से लगातार बमबारी और हमले होते रहे। गांव के युवक रात-रात भर जागकर पहरा देते थे। पूरे इलाके में डर और अनिश्चितता का माहौल था।

आधिकारिक रूप से 14 लोग मारे गए

14 मार्च 2007 की सुबह हालात बेहद हिंसक हो गए। पुलिस बल सड़कों से अवरोध हटाने के बहाने आया, लेकिन जब ग्रामीण पीछे नहीं हटे तो पुलिस और सीपीएम कार्यकर्ताओं ने निहत्थे लोगों पर गोली चला दी। नंदीग्राम गोलीकांड में कई लोग मारे गए और अनेक घायल हुए। इस दौरान महिलाओं के साथ यौन हिंसा और उत्पीड़न की घटनाएं भी सामने आईं, जिसने पूरे राज्य को झकझोर दिया। मृतकों की संख्या को लेकर विवाद रहा, लेकिन आम तौर पर 14 लोगों की मौत मानी जाती है, हालांकि वास्तविक संख्या इससे अधिक बताई जाती है। कई लोग लापता हो गए और कुछ ने बाद में चोटों के कारण दम तोड़ा। इस घटना की जांच सीबीआई ने भी की।

तेभागा, नक्सलबाड़ी के बाद सबसे बड़ा आंदोलन

14 मार्च के बाद भी हिंसा खत्म नहीं हुई। खेजुरी और नंदीग्राम के बीच तालपटी नहर एक तरह की सीमा बन गई और दोनों इलाकों के बीच लगातार संघर्ष चलता रहा। इस संघर्ष ने सामाजिक जीवन को पूरी तरह तोड़ दिया। लोग एक-दूसरे के यहां आना-जाना बंद कर चुके थे। पूरे साल में 50 से अधिक लोगों की मौत होने का अनुमान है। नवंबर 2007 में फिर से हिंसा भड़की, जब कई लोग अपने घर छोड़कर भागने को मजबूर हुए। उस समय के राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने भी नंदीग्राम की घटनाओं पर गहरी चिंता जताई। नंदीग्राम का आंदोलन ऐतिहासिक साबित हुआ। तेभागा आंदोलन और नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद यह एक और बड़ा किसान आंदोलन था, जिसने भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया। ओडिशा के कलिंगनगर और पोस्को आंदोलनों के साथ मिलकर इसने केंद्र सरकार को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने के लिए मजबूर किया। सिंगूर और नंदीग्राम दोनों आंदोलनों की शुरुआत स्वतःस्फूर्त थी, जहां आम किसान अपनी पहचान के साथ खड़े हुए। बाद में ममता बनर्जी के नेतृत्व में ये आंदोलन तृणमूल कांग्रेस के तहत संगठित हुए।

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