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'कभी एक-दूसरे की तारीफ, तो कभी किया तीखा हमला', उतार-चढ़ाव वाली रही है मोदी-ममता की 'दोस्ती'

Mamata Modi Friendship: भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते की अगर बात करें तो यह खट्टे-मीठे अनुभव वाला रहा है। 1998 से 2006 तक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जो सरकार थी, टीएमसी उसका हिस्सा रही।

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कभी एक दूसरे की तारीफ भी करते थे ममता और मोदी।
Written by: Alok Rao
Updated May 4, 2026, 05:20 IST

Mamata Modi Friendship: कहा जाता है कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होता। राजनीतिक दुश्मन कभी मुद्दों पर तो कभी 'सुविधा' के नाम पर दोस्त बन जाते हैं। भारतीय लोकतंत्र की यह खूबी है कि मुद्दों और नीतियों पर एक दूसरे का विरोध करते हुए नेता व्यक्तिगत स्तर पर हमलावर नहीं होते। वैचारिक मतभेद रखते हुए भी ये एक दूसरे का सम्मान और आदर करते हैं। राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां मुद्दों पर नेता एक दूसरे के प्रखर विरोधी और आलोचक रहे लेकिन निजी स्तर पर उनकी मित्रता बनी रही। सरकार में कभी साथ रहे तो बाद में अलग भी हुए। राजनीतिक विरोधी रहते हुए भी अपने व्यक्तिगत संबंधों पर कभी आंच नहीं आने दी। हम बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की।

इन दोनों दिग्गज नेताओं की राजनीतिक शत्रुता जगजाहिर है। SIR, एनआरसी जैसे मुद्दों पर ममता के तेवर भाजपा के खिलाफ कैसे हैं, ये बताने की जरूरत नहीं है। खुले मंच से ये दोनों नेता एक-दूसरे पर तीखा हमला करने और तंज कसने में कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते।

कभी एक-दूसरे की प्रशंसा भी करते थे

बंगाल चुनाव में प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने ममता को कभी 'स्पीडब्रेकर दीदी' कहा तो ममता ने उन्हें 'एक्सपायरी बाबू' और 'देश के लिए खतरनाक' बताकर पलटवार किया। यहां तक कि पीएम की तुलना रावण से की। लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर देखें तो मोदी और ममता जब भी एक दूसरे से मिलते हैं तो उनमें उस तरह की कड़वाहट नजर नहीं आई जैसे कि दो अलग-अलग विरोधी दल के नेताओं में होती है। मोदी और ममता को सम्मान देते रहे हैं। विरोधी होते हुए भी इनका आपसी केमेस्ट्री अच्छी मानी जाती है। एक समय ऐसा भी रहा जब मोदी और ममता एक-दूसरे की प्रशंसा किया करते थे।

एनडीए की सरकार में रेल मंत्री थीं ममता

भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते की अगर बात करें तो यह खट्टे-मीठे अनुभव वाला रहा है। 1998 से 2006 तक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जो सरकार थी, टीएमसी उसका हिस्सा रही। एनडीए की इस सरकार में ममता रेल मंत्री थीं। हालांकि, तहलका प्रकरण को लेकर ममता की पार्टी 2001 में अलग भी हुई। यही नहीं, 2006 का विधानसभा चुनाव भी टीएमसी ने भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ा था।

फिर एक जैसे नहीं रहे हैं ममता-मोदी के रिश्ते

ममता और मोदी के बीच के बीच रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। इसमें भी उतार-चढ़ाव होता रहा है। साल 2014 में जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की प्रशंसा की। संसद में मोदी ने कहा कि '35 सालों के कुशासन से मेरी बहन ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को निकालने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं। हम इसका सम्मान करते हैं।' यहां तक कि आरएसएस ने भी 2012 में ममता की प्रशंसा करते हुए अपने मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' में उन्हें 'दुर्लभ किस्म' का नेता बताया। इसके कुछ दिन बाद बनर्जी ने गुजरात में हुए विकास का जिक्र करते हुए मोदी की तारीफ की।

जब ममता ने गुजरात के विकास की प्रशंसा की

फेडेरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) के 85वें वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता ने कहा कि 'गुजरात की देखभाल ठीक तरीके से हो रही है और यह विकास कर रहा है।' इसी राजनीतिक दौर में मोदी-ममता की 'दोस्ती' पर अन्य विरोधी दलों नाक-भौंह भी सिकोड़ते दिखे। जून 2015 में पीएम मोदी जब बंगाल के दौरे पर आए तो ममता बनर्जी उनके साथ रहीं, इस पर राहुल गांधी ने तंज कसा। उन्होंने कहा, 'जब हमारी सरकार थी तो हमारे पीएम ममता को लेकर बांग्लादेश दौरे पर जाना चाहते थे लेकिन उन्होंने मना कर दिया। ममता ने कहा-एकला चलो रे। अब मोदी जी यहां हैं तो वह एकला चलो रे की कोई बात नहीं है। अब वह साथ जा रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? यह किस तरह की मित्रता है? आपको वजह जरूर पता होगी।'

ममता मुझे कुर्ता-मिठाइयां भेजती हैं-पीएम मोदी

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान अभिनेता अक्षय कुमार को दिए गए एक साक्षात्कार में पीएम मोदी ने ममता बनर्जी के साथ अपने संबंध का जिक्र किया। पीएम ने कहा कि विपक्ष के कई नेताओं के साथ उनके अच्छे रिश्ते हैं और इनमें ममता भी शामिल हैं। पीएम ने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं टीएमसी प्रमुख अभी भी साल में एक या दो बार उन्हें कुर्ता और बंगाली मिठाइयां भेजती हैं। पीएम ने कहा कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पहले बंगाली मिठाइयां भेजना शुरू किया, बाद में ममता ने भी इसे अपना लिया।

2016 के विस चुनाव से रिश्ते में तल्खी आनी शुरू हुई

समझा जाता है कि लंबे समय तक मोदी और ममता के बीच सौहार्द रिश्ते बने रहे लेकिन इसमें गिरावट की शुरुआत 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से मानी जाती है। इस चुनाव में भाजपा को 55 लाख वोट मिले और उसका वोट शेयर 10.2 प्रतिशत रहा। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में 17 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि वहां उसे बड़ा खिलाड़ी नहीं माना जाता था। तभी से बनर्जी की चिंताएं बढ़ने लगी थीं। लेकिन 2016 में भाजपा ने साफ कर दिया कि पश्चिम बंगाल उसकी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है। मार्च 2016 के अंत में एक रैली में मोदी ने लगभग एक घंटे का आक्रामक भाषण दिया और बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी सरकार पर सीधे हमला बोला। उन्होंने मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार और उगाही के आरोप लगाए और शारदा घोटाले तथा नारदा स्टिंग का जिक्र किया।

बंगाल में भाजपा के बढ़ते कद से चिंतित हुईं ममता

अप्रैल की एक और रैली में मोदी ने कोलकाता फ्लाईओवर हादसे, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी, उसका जिक्र करते हुए लोगों को तृणमूल कांग्रेस से बचने की सलाह दी। अप्रैल 2017 के एक विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर जगह बनाई, जिससे टीएमसी की चिंताएं और बढ़ गईं। मई 2018 के पंचायत चुनावों में भाजपा टीएमसी से काफी पीछे दूसरे स्थान पर रही, लेकिन उसने राज्य के पारंपरिक दलों वाम दलों और कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया। इस दौरान भाजपा और टीएमसी के शीर्ष नेताओं के बीच तीखे हमले जारी रहे और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच भी झड़पें होती रहीं। शारदा और नारदा मामलों को लेकर मोदी और भाजपा के सीधे हमलों ने इस राजनीतिक टकराव को और भड़का दिया।

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