Bihar SIR Hearing: बिहार SIR मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि एक आरोप यह था कि ड्राफ्ट मतदाता सूची में बड़ी संख्या में लोगों के नाम थे, लेकिन अचानक उनके नाम लिस्ट से गायब हो गए। मुझे अब तक तीन हलफनामे मिले हैं, हमने इसकी जांच की है, यह हलफनामा पूरी तरह से झूठा है। बिहार SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी।
चुनाव आयोग की दलीलें
आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि ये भी आरोप लगाया गया था कि ड्राफ्ट लिस्ट में मौजूद लोगों का नाम फाइनल लिस्ट से गायब है, उन्हें कारण बताया नहीं गया। याचिकाकर्ताओं की तरफ से जो जानकारी दी गई है, वह गलत है। राकेश द्विवेदी ने कहा कि जिस एक व्यक्ति की बात हलफनामे में की गई है, उसका नाम ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं था, उसने गणना प्रपत्र (Enumeration Form) जमा ही नहीं किया था।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हम DLSA के सेक्रेटरी को इस पर ध्यान देने का निर्देश दे सकते हैं। हलफनामा देने में कुछ भी गलत नहीं लगता, अन्य लोग भी ऐसा कर सकते हैं, लेकिन हमें चुनाव आयोग को इसकी पुष्टि के लिए समय देना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR में इन कार्यवाहियों के परिणाम से परे एक प्रमुख मुद्दा यह है कि लगभग 3.7 लाख व्यक्तियों को, जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं, उनके अपील करने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए। जिस पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को कारण सहित आदेश की प्रति दी गई है।
चूंकि अपील दायर करने की अवधि चल रही है, इसलिए अदालत ने अंतरिम उपाय (Interim Measure) के रूप में यह उचित समझा कि बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (Bihar Legal Services Authority) के अध्यक्ष को निर्देश दिया जाए कि वे राज्य की सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (District Legal Services Authorities) के सचिवों को यह सूचना भेजें कि ऐसे पैरा लीगल वॉलंटियर्स (Para Legal Volunteers) की सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं जो अंतिम वोटर सूची से बाहर किए गए व्यक्तियों की अपील दाखिल करने में मदद करें।
सचिव को निर्देश दिया गया है कि हर जिले में पैरालीगल वॉलंटियर्स की संख्या को पुनः अधिसूचित (Renotify) किया जाए। BLO (Booth Level Officer) को यह जानकारी एकत्र करने का निर्देश दिया जाए कि कौन-कौन व्यक्ति अंतिम सूची से बाहर किए गए हैं। इसके बाद पैरालीगल वॉलंटियर्स उन व्यक्तियों तक पहुंचें, उन्हें उनके अपील करने के अधिकार की जानकारी दें। अपील दाखिल करने की प्रक्रिया में मदद करें, और विधिक सहायता (Legal Aid) प्रदान करें।
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी निर्देश दिया कि इस कार्य की स्थिति रिपोर्ट एक सप्ताह में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। ये दिशा-निर्देश उन व्यक्तियों पर भी लागू होंगे, जिनके नाम प्रारूप मतदाता सूची (Draft Roll) में भी शामिल नहीं किए गए थे। बिहार SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी। याचिकर्ताओं द्वारा उठाए गए सवालों पर चुनाव आयोग हलफनामा दाखिल करेगा।
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने अदालत से आग्रह किया कि चुनाव आयोग यह सार्वजनिक करे कि कितने लोगों को गैर-नागरिक या विदेशी पाए जाने के आधार पर मतदाता सूची से हटाया गया। यादव ने कहा कि यदि यह जानकारी सामने लाई गई तो यह देश की बड़ी सेवा होगी।
योगेंद्र यादव ने कई सवाल उठाए
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को यह बताना चाहिए कि इस प्रक्रिया में कितने लोगों के नाम नागरिकता के आधार पर हटाए गए। यादव ने कहा, अगर अदालत चुनाव आयोग को यह जानकारी उजागर करने का निर्देश दे, तो यह देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। संदर्भ के लिए, चुनाव आयोग ने जून में SIR अभियान की घोषणा करते समय मतदाता सूची में अवैध प्रवासियों और गैर-नागरिकों की उपस्थिति को लेकर चिंता जताई थी। यादव ने बताया कि सीमांचल क्षेत्र- जहां अवैध प्रवासियों की उपस्थिति को लेकर सबसे अधिक आशंकाएँ जताई गई, वहां भी बहुत कम नाम हटाए गए।
चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए यादव ने कहा, 7.4 करोड़ मतदाताओं में से सिर्फ 1,087 आपत्तियां नागरिकता के आधार पर दर्ज हुईं, जिनमें से 390 सही पाई गईं। यही अधिकतम संख्या है जिनके नाम घुसपैठिया होने के आधार पर हटाए गए। 796 लोगों ने तो खुद आवेदन दिया कि मैं विदेशी हूं। योगेन्द्र यादव ने SIR अभियान को देश के इतिहास में मतदाता सूची की सबसे बड़ी कटौती करार दिया और बताया कि 47 लाख नाम सूची से हटाए गए।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण यह संख्या नियंत्रित रही, वरना 2 करोड़ नाम मतदाता सूची हटाए जा सकते थे। नई प्रविष्टियों को लेकर भी यादव ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 21 लाख नई प्रविष्टियों में 18–19 वर्ष के मतदाता 20 फीसदी से भी कम हैं, जबकि 40 फीसदी से अधिक प्रविष्टियां 25 वर्ष से ऊपर के लोगों की हैं। उन्होंने यह भी बताया कि 1.4 लाख लोगों ने खुद अपने नाम हटाने की मांग की, जिनमें 41 ने खुद को मृत बताया और आयोग ने 39 को सूची से हटा भी दिया।
