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नेपाल आपदा से सबक: उत्तराखंड में लग रहा ग्लेशियर झील'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम', सीधा सवाल क्या बचेंगी जान? जानें- क्यों जरूरी

Vasundhara Tal Chamoli GLOF Monitoring: उत्तराखंड ने चमोली के अति-संवेदनशील वसुंधरा ताल में राज्य का पहला ग्लेशियर झील पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का काम शुरू कर दिया है। जानें इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हर बड़ी बात।

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नेपाल आपदा से सबक: उत्तराखंड में लग रहा ग्लेशियर झील'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम', सीधा सवाल क्या बचेंगी जान? जानें- क्यों जरूरी

Uttarakhand Glacial Lake Early Warning System: नेपाल में हिमनद झील फटने से आई भीषण तबाही और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरों को देखते हुए उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य सरकार ने चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित 'वसुंधरा ताल' (Vasundhara Tal) में उत्तराखंड की पहली ग्लेशियर लेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (Early Warning System) स्थापित करने के लिए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की टीम को रवाना कर दिया है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के विशेषज्ञों द्वारा वसुंधरा ताल को सबसे उच्च-जोखिम (Category-A) वाली ग्लेशियर झीलों में शामिल किया गया था।

क्यों पड़ी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत?

ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलें (Glacial Lakes) जब अत्यधिक पानी या भूस्खलन/हिमस्खलन के दबाव के कारण टूटती हैं, तो ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की भीषण स्थिति पैदा होती है।

नेपाल की हालिया तबाही से सबक: अगस्त 2026 में नेपाल की ल्हेंदे खोला और भोटे कोशी नदी में ग्लेशियर टूटने से सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी और भारी तबाही हुई थी।

उत्तराखंड में खतरे की घंटी: वर्ष 2023 के इसरो (NRSC) आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में 344 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 13 झीलों को अत्यधिक जोखिमपूर्ण (High Risk) माना गया है। इनमें चमोली की वसुंधरा ताल और सरस्वती ताल, उत्तरकाशी की केदारताल और पिथौरागढ़ की झीलें शामिल हैं।

कैसे काम करेगा यह अत्याधुनिक निगरानी तंत्र?

चूंकि वसुंधरा ताल अत्यधिक ऊंचाई पर और बिना मोबाइल नेटवर्क वाले दुर्गम इलाके में स्थित है, इसलिए यहाँ लगाए जाने वाले सभी उपकरण सौर ऊर्जा (Solar Energy) से चलेंगे और सैटेलाइट कम्यूनिकेशन के जरिए सीधे देहरादून बेस स्टेशन को रियल-टाइम डेटा भेजेंगे।

ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS): यह हवा की गति, तापमान, आर्द्रता, बारिश और वायुमंडलीय दबाव का रिकॉर्ड रखेगा।

वाटर लेवल एवं फ्लो सेंसर: झील के जलस्तर में होने वाले अचानक उतार-चढ़ाव और पानी की निकासी दर को मापेगा।

स्नो एवं टिल्ट सेंसर: आसपास की बर्फ की मोटाई, ग्लेशियर के तापमान और जमीन में होने वाली किसी भी तरह की हलचल, कंपन या झुकाव का तुरंत पता लगाएगा।

ऑटोमैटिक अलर्ट: यदि जलस्तर या कंपन तय खतरे के निशान (Threshold Limit) को पार करता है, तो सिस्टम स्वतः ही कंट्रोल रूम और निचले इलाकों की बस्तियों के लिए अलर्ट जारी कर देगा।

निचले इलाकों को आपदा से बचाएगा डेटा

उत्तराखंड के मुख्य सचिव और आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, इस डेटा का मुख्य उद्देश्य निचले इलाकों में बसे गांवों, सेना के शिविरों, जलविद्युत परियोजनाओं और बद्रीनाथ यात्रा मार्ग को सुरक्षित रखना है। वसुंधरा ताल में इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद राज्य की अन्य 12 हाई-रिस्क ग्लेशियर झीलों में भी इसी तरह के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाए जाएंगे। इसके तहत, मंगलवार से चमोली की वसुंधरा ताल में ग्लेशियल झील के लिए राज्य का पहला अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम (समय से पहले चेतावनी देने वाला सिस्टम) लगाया जा रहा है।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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