Uddhav Thackeray News: उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र में जब महाविकास अघाड़ी के तले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए तो उम्मीद भी नहीं रही होगी उनका अपना विश्वस्त(एकनाथ शिंदे) ही कुर्सी का दावेदार बन जाएगा। ठाकरे के हाथ से ना सिर्फ सत्ता गई बल्कि पार्टी से हाथ धो बैठे। बाला साहेब ठाकरे की पहचान का असली मालिक अब एकनाथ शिंदे(Eknath Shinde) हैं। चुनाव आयोग में शिवसेना बनाम शिवसेना की लड़ाई में उद्धव ठाकरे अपनी बात सही तरह से नहीं रख पाए। चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ उनकी अर्जी सुप्रीम कोर्ट में है। इसके साथ ही अदालत उस मामले की सुनवाई कर रही है जिसमें एकनाथ शिंदे के सीएम बनने को असंवैधानिक बताया गया है। पांच जजों की संवैधानिक पीठ(चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ अगुवाई कर रहे हैं) ने तत्कालीन राज्यपाल बी एस कोश्यारी की भूमिका पर जहां सवाल उठाया वहीं उद्धव ठाकरे पक्ष से पूछा कि जब आपने विश्वास मत का सामना ही नहीं किया तो सराकर को दोबारा स्थापित करने की बात ही कहां आती है। अदालत(Supreme court on Shivsena) की इस टिप्पणी से साफ है कि उन्हें राहत नहीं मिलने वाली। संवैधानिक पीठ ने यह भी कहा कि अगर राज्यपाल के फैसले में दोष निकाला भी जाए उस सूरत में भी आपको दोबारा कुर्सी नहीं मिल सकती।
सुप्रीम कोर्ट में जिरह
चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने उद्धव ठाकरे की वकील अभिषेक मनु सिंघवी से कहा कि यह एक तार्किक बात होती अगर आप विधानसभा के पटल पर विश्वास मत खो देते। फिर स्पष्ट रूप से आपको एक विश्वास मत के कारण सत्ता से बेदखल कर दिया गया है जिसे अलग कर दिया गया है। हमारी समस्या है, बौद्धिक पहेली को देखें। ऐसा नहीं है कि आपको राज्यपाल द्वारा गलत तरीके से बुलाए गए विश्वास मत के कारण सत्ता से बेदखल किया गया है। आपने किसी भी कारण से नहीं चुना आप विश्वास मत का सामना नहीं करना चाहते थे।सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ के मुताबिक ठाकरे को फिर से नियुक्त करने का मतलब उस सरकार को बहाल करना होगा, जिसने स्वीकार किया था कि वह राज्य विधानमंडल में अल्पसंख्यक थी। पीठ ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि अ दालत एक ऐसे मुख्यमंत्री को कैसे बहाल कर सकती है, जिसने शक्ति परीक्षण का सामना भी नहीं किया हो। यह पूछे जाने पर कि क्या ठाकरे ने इसलिए पद छोड़ा क्योंकि उन्हें विश्वास मत का सामना करने के लिए कहा गया था। इस सवाल के जवाब में सिंघवी कहा कि उद्धव ठाकरे ने पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और अदालत द्वारा विश्वास मत को आगे बढ़ाने के बाद ही इस्तीफा दिया था।
ठाकरे खेमे से इस तर्क पर भी सवाल किया गया कि राज्यपाल शिवसेना विधायकों (शिंदे खेमे के) द्वारा लिखे गए पत्र के आधार पर विश्वास मत नहीं मांग सकते थे। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि किसी भी पार्टी के आंतरिक मतभेद राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं। अदालत ने पूछा कि जब विधायकों का एक समूह यह कहता है कि उन्होंने एक नेता से समर्थन वापस ले लिया है तो राज्यपाल संख्या को क्यों नहीं देख सकते। क्या राज्यपाल संख्याओं को नहीं देख सकते हैं और यह मानते हुए कह सकते हैं कि ये लोग कहते हैं कि वे चले गए हैं, क्या उन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ा है, स्पीकर द्वारा तय किया जाएगा ? इस सवाल के जवाब में सिब्बल ने कहा कि अगर इसकी अनुमति दी जाती है, तो दसवीं अनुसूची या दल-बदल विरोधी कानून बेमानी हो जाएगा और 1985 में इस कानून के पेश होने से पहले के समय में वापस चला जाएगा।हालांकि, शीर्ष अदालत ने महसूस किया कि सरकार को जवाबदेह होना चाहिए और सदन का विश्वास होना चाहिए। इस पर सिब्बल ने कहा कि रास्ता यही है कि विधायक वित्त विधेयक के खिलाफ मतदान करें और ऐसी स्थिति में सरकार गिर जाए।
क्या कहते हैं जानकार
अब इस विषय पर जानकारों का कहना है कि अदालत की टिप्पणी से साफ है कि उद्धव ठाकरे के पक्ष में फैसला जाने की उम्मीद कम है। ऐसी सूरत में उनके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचता है कि वो जनता के बीच जाकर अपनी बात रखें और समझाने की कोशिश करें कि किस तरह से एकनाथ शिंदे ने बाला साहेब ठाकरे के साथ विश्वासघात किया था। लेकिन सवाल यह है कि वो एनसीपी और कांग्रेस के साथ अपने किए गए गठबंधन को सही फैसला ठहराएंगे।
