सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया जिसमें तमिलनाडु सरकार के मंदिर के फंड से मैरिज हॉल बनाने के फैसले को खारिज कर दिया गया था। ये मामला पलानी के अरुलमिघु धंडायुधपानी स्वामी मंदिर से जुड़ा है। मंदिर प्रशासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी। लेकिन जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इससे इनकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश की बरकरार रखा लागू रहेगा।
मंदिर फंड के इस्तेमाल पर SC की नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि मंदिर की संपत्ति और परिसर का इस्तेमाल मैरिज हॉल बनाने के लिए नहीं होना चाहिए, जहाँ अश्लील गानों पर लोग डांस करेंगे। कोर्ट ने राज्य सरकार और मंदिर अधिकारियों से पूछा कि मंदिर के सरप्लस फंड से स्कूल-कॉलेज या अस्पताल जैसे जनहित के काम के लिए क्यों नहीं किया जा रहा?
SC में अगली सुनवाई अब 9 नवंबर को
सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की तरफ से दाखिल याचिका को स्वीकार करते हुए मामले को 19 नवंबर को अगली सुनवाई के लिए लिस्ट किया है। ऐसे में फिलहाल मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक मंदिर निधि के इस्तेमाल पर लगी रोक जारी रहेगी। सुनवाई के दौरान जस्टिस मेहता ने मंदिर अधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि इस बीच अगर मंदिर की निधि से एक पैसा भी खर्च हुआ तो इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा।
मंदिर पक्ष ने फंड के इस्तेमाल को लेकर क्या तर्क दिए?
तमिलनाडु सरकार और मंदिर प्रशासन की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी, सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता और राज्य के एडवोकेट जनरल पी.एस. रमन पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि शादी हाल बनाने के पीछे का मकसद व्यावसायिक लाभ कमाना नहीं, बल्कि मंदिर को आर्थिक रूप से मजबूत करना है। एडवोकेट जनरल ने उदाहरण दिया कि मंदिर की निधि से बने एक विवाह मंडप(मैरिज हॉल) से 7 लाख रुपये रोजाना की आय होती है, जो सीधे मंदिर को मिलती है और इससे देवताओं की सेवा और प्रबंधन में मदद मिलती है।
सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता ने कहा कि विवाह मंडप बनने के साथ ही मंदिर संपत्ति की पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने यह भी दलील दी कि जो लोग यहां शादी के लिए आएंगे, वो खुद ही इस जगह की पवित्रता को बनाए रखने का महत्व समझेंगे। जिन्हें शराब या मांसाहारी भोजन का सेवन करना होगा वो जाहिर तौर पर किसी प्राइवेट मैरिज हॉल को बुक करेंगे।
तमिलनाडु सरकार के फैसले के विरोध की वजह
मद्रास हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता रहे रामा रविकुमार की ओर से सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्णकुमार ने तर्क दिया कि तमिलनाडु सरकार ऐसा बर्ताव कर रही है कि हिंदू धार्मिक स्थल उसकी निजी संपत्ति हों।उन्होंने कहा कि मंदिर के फंड से विवाह मंडप जैसे व्यावसायिक निर्माण के पीछे धार्मिक उद्देश्य नहीं बल्कि व्यावसायिक लाभ है। यह हिंदू धार्मिक एवं परोपकारी अधिनियम, 1959 (HR\&CE Act) का उल्लंघन है और भक्तों द्वारा धार्मिक उद्देश्य से दिए जा रहे दान का दुरुपयोग है।
