साइबर क्राइम (Cyber Crime) के गंभीर रूपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में इंटरनेट पर शारीरिक हिंसा की धमकी, निजी जानकारी सार्वजनिक करने, बच्चों के स्कूल का पता या स्थान उजागर करने, बिना सहमति अंतरंग सामग्री प्रसारित करने और एआई से तैयार की गई आपत्तिजनक सामग्री जैसे गंभीर डिजिटल अपराधों से निपटने के लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निबटारा करते हुए केंद्र सरकार को इस मामले पर कड़ा एक्शन लेने को कहा है।
याचिकाकर्ता की ओर से क्या कहा गया?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट नरेंद्र गोस्वामी ने अदालत के सामने सवाल रखा, “मान लीजिए आज रात 9 बजे किसी महिला के घर का पता इंटरनेट पर डाल दिया जाता है और उसके साथ दुष्कर्म की धमकी दी जाती है। क्या इस स्तर पर भी उस सामग्री को ऑनलाइन रहने दिया जाएगा?”
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि याचिका में साइबर अपराध के अलग-अलग तरीकों, प्रकारों और पहलुओं को अच्छी तरह सामने रखा गया है। उन्होंने कहा कि इन अपराधों का पता कैसे लगाया जाए और इनकी रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जाएं, यह विशेषज्ञों के क्षेत्र से जुड़े विषय हैं।
सरकार को शिकायत पर कार्रवाई के निर्देश
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने बताया कि इन मुद्दों को पहले ही सरकार के सामने एक आवेदन के जरिए उठाया जा चुका है। CJI सूर्यकांत ने पूछा कि यह किन अधिकारियों या मंत्रालयों को दिया गया है। याचिकाकर्ता ने बताया कि इसे केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, गृह मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिवों को संबोधित किया गया है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने इन मुद्दों को 22 जून को एक आवेदन के जरिए संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों के सामने पहले ही रखा है। अदालत ने कहा कि फिलहाल जरूरी सुधारात्मक कार्रवाई संबंधित अधिकारियों को करनी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों और अन्य सभी हितधारकों को याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया।
किन डिजिटल अपराधों का मुद्दा उठाया गया?
याचिका में ऐसे डिजिटल नुकसान को गंभीर बताया गया है जिनका सीधा असर किसी व्यक्ति की सुरक्षा, निजता और गरिमा पर पड़ सकता है। इसमें शारीरिक हिंसा या हिंसा की धमकी, खतरनाक विषैले पदार्थों से जुड़े खतरे, निजी जानकारी सार्वजनिक करना, बच्चों के स्कूल का स्थान बताना, बिना सहमति अंतरंग सामग्री साझा करना और किसी व्यक्ति की डिजिटल पहचान का नुकसान पहुंचाने वाले तरीके से इस्तेमाल जैसे मामले शामिल हैं।
याचिका में तर्क दिया गया है कि इस तरह के साइबर अपराध व्यक्ति के समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता, गरिमा और जीवन के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन कर सकते हैं।
