Supreme Court Sabarimala Dispute: सुप्रीम कोर्ट में आज से सबरीमाला मंदिर विवाद से जुड़े संवैधानिक सवालों पर 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई करेगी। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली यह पीठ सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि धार्मिक परंपरा बनाम मौलिक अधिकारों के टकराव पर व्यापक फैसला दे सकती है।
इस सुनवाई का असर मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना (FGM) जैसे मुद्दों पर भी पड़ सकता है।
2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उपजा था विवाद
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। यह फैसला उस परंपरा के खिलाफ था जिसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिसके बाद कोर्ट ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने विस्तृत लिखित दलीलें दाखिल करते हुए 2018 के फैसले के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए दाखिल इन दलीलों में कहा गया कि
1. पूजा स्थलों में प्रवेश का सवाल लैंगिक भेदभाव का नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा और आस्था का हिस्सा है।
2. यह किसी विशेष देवता की प्रकृति और मान्यता से जुड़ा होता है।
'कोर्ट धार्मिक मान्यताओं की जांच न करे'
केंद्र ने कोर्ट को आगाह किया कि वह धार्मिक प्रथाओं का परीक्षण तर्क, आधुनिकता या वैज्ञानिकता के आधार पर न करे। सरकार का कहना है कि ऐसा करना अदालत द्वारा अपने विचारों को धर्म पर थोपने जैसा होगा।
दलीलों में कहा गया है कि, 'कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं, क्योंकि यह संवैधानिक समीक्षा का दायरा नहीं है।'
'जज धर्मग्रंथों के विशेषज्ञ नहीं': केंद्र
केंद्र ने स्पष्ट कहा कि जज धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने या धर्मशास्त्रीय सवाल तय करने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते। सरकार के अनुसार, अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है। यह अधिकार संबंधित धार्मिक समुदाय या संप्रदाय को ही होना चाहिए
'Essential Religious Practice' पर केंद्र का बड़ा रुख
केंद्र ने Essential Religious Practice (जरूरी धार्मिक प्रथा) के सिद्धांत पर सवाल उठाए। सरकार ने कहा कि किसी प्रथा की अनिवार्यता का निर्धारण अदालत नहीं, बल्कि धर्म मानने वाले लोग करें। आस्था और विश्वास संविधान द्वारा संरक्षित स्वतंत्रताएं हैं। ऐसे में कानूनी दखल केवल तब दखल हो सकता है जब मामला सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता या मौलिक अधिकारों से टकराए।
'भगवान के स्वरूप की समीक्षा नहीं कर सकता कोर्ट'
केंद्र ने एक बड़ा संवैधानिक तर्क देते हुए कहा कि देवता के गुणों और स्वरूप की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती। सबरीमाला मंदिर में पूजे जाने वाले भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है। सरकार के लिखित जवाब के मुताबिक, महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। कोर्ट इस स्वरूप को बदलने या पुनर्परिभाषित करने का अधिकार नहीं रखता है। कोर्ट द्वारा ऐसा करना श्रद्धालुओं की आस्था को गलत ठहराने जैसा होगा।
2018 के फैसले की भी की आलोचना
केंद्र ने 2018 के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि उस समय की पीठ ने यह जांच की कि क्या भगवान अयप्पा का ब्रह्मचर्य जरूरी है। सरकार के अनुसार यह अदालत को धार्मिक निर्णायक (theological arbiter) बना देता है, जो संविधान के अनुरूप नहीं है।
'संवैधानिक नैतिकता' पर केंद्र की आपत्ति
केंद्र ने 'constitutional morality' (संवैधानिक नैतिकता) के सिद्धांत को भी चुनौती दी है। सरकार का कहना है कि यह एक अस्पष्ट और न्यायिक रूप से विकसित अवधारणा है। इसका संविधान में कोई स्पष्ट आधार नहीं है। इसका इस्तेमाल कर अदालतें धार्मिक परंपराओं को बदल सकती हैं। केंद्र ने चेतावनी दी कि इससे न्यायिक निर्णयों में सब्जेक्टिवटी बढ़ेगी।
'कोर्ट संविधान में संशोधन जैसा काम न करे'
सरकार ने कहा कि अगर अदालतें अपने नैतिक मानकों के आधार पर फैसले देंगी, तो यह संविधान संशोधन जैसा होगा। जबकि संविधान संशोधन का एक तय प्रक्रिया है, और ये संसद में ही किया जा सकता है।
'Joseph Shine केस अच्छा कानून नहीं'
केंद्र ने एक बड़ा कदम उठाते हुए Joseph Shine vs Union of India मामले को भी चुनौती दी है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार (adultery) को अपराध नहीं माना था।केंद्र का तर्क है कि इस फैसले में भी संवैधानिक नैतिकता का ज्यादा इस्तेमाल हुआ। यह संविधान के अनुरूप नहीं था।
कोर्ट के बाहर की बातों पर राय बनाने पर आपत्ति
केंद्र ने यह भी कहा कि जजों के फैसले केवल संविधान, कानून और पूर्व निर्णयों पर आधारित होने चाहिए। अकादमिक लेख, भाषण, पॉडकास्ट जैसी चीजों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। सरकार के अनुसार ऐसे स्रोत व्यक्तिगत विचार होते हैं, न कि स्थापित कानून हैं।
2019 के सवालों पर होगी विस्तृत बहस
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 7 बड़े संवैधानिक सवाल तय किए थे, जिनमें मुख्य तौर शामिल हैं:
1.धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा
2.'Essential Religious Practice' की परिभाषा
3.संवैधानिक नैतिकता की भूमिका
अब 9 जजों की पीठ इन्हीं सवालों पर अंतिम दिशा तय कर सकती है।
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